Jeevika Didis

Jeevika Didis : बिहार की ग्रामीण महिलाएं, जिन्हें आज हम “जीविका दीदी” के नाम से जानते हैं, मेहनत और लगन की एक मिसाल बन चुकी हैं। महज़ पांच सालों में इन महिलाओं ने वो कर दिखाया है, जिसकी कल्पना भी पहले मुश्किल लगती थी। जी हाँ, देशभर में जब महिलाओं के आत्मनिर्भर बनने की बात होती है, तो बिहार की जीविका दीदियां सबसे आगे नज़र आती हैं।

Jeevika Didis

70 कंपनियों की मालकिन बनीं बिहार की दीदियां

जीविका प्रशासन के अनुसार, कंपनी चलाने में बिहार की महिलाएं आज पूरे देश में पहले स्थान पर हैं। आंध्र प्रदेश की महिलाएं जहाँ 15 कंपनियां चला रही हैं, वहीं बिहार की दीदियां 70 कंपनियों का संचालन कर रही हैं। इनमें से 61 कंपनियां कृषि क्षेत्र से जुड़ी हैं, छह गैरकृषि क्षेत्र में काम कर रही हैं, जबकि तीन पशुपालन से संबंधित हैं।

यानी अब ये महिलाएं केवल घर और परिवार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अपने हुनर और मेहनत के बल पर बड़े स्तर पर व्यवसाय संभाल रही हैं।

 Jeevika Didis

 

10 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार

किसी भी छोटे व्यवसाय की सफलता का पैमाना होता है उसकी आमदनी। जीविका दीदियों ने इस मामले में भी कमाल कर दिखाया है। आज उनका कुल कारोबार 10 करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है।

  • कृषि
  • शिल्प कला
  • पशुपालन
  • और छोटेछोटे व्यवसाय

इन सबके जरिए महिलाओं ने अपनी आमदनी को बढ़ाया है। पहले जो महिलाएं 10–20 हजार रुपये की पूंजी से शुरुआत करती थीं, वही आज सालाना लाखों और करोड़ों का कारोबार कर रही हैं।

शहद और बकरी पालन में कमाया नाम

जीविका दीदियों ने न केवल स्थानीय स्तर पर, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनाई है।

  • शहद उत्पादन : इसके लिए कौशिकी प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेडबनाई गई। इस कंपनी से 30,135 महिलाएं जुड़ी हैं और इसका वर्तमान कारोबार 5 करोड़ रुपये से अधिक है। खास बात यह है कि इन दीदियों का शहद आज देश की मशहूर कंपनी डाबर को सप्लाई किया जा रहा है।
  • बकरी पालन : इसी तरह गोट प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेडमें 20,956 महिलाएं जुड़ी हैं। यह कंपनी सालाना 2.6 करोड़ रुपये का कारोबार कर रही है।

इसके अलावा दूध उत्पादन और आपूर्ति के क्षेत्र में भी कई बड़ी कंपनियों से समझौते किए गए हैं।

 Jeevika Didis

कैसे हुई थी शुरुआत?

बिहार में जीविका योजना की शुरुआत साल 2006 में हुई थी। यह कार्यक्रम ग्रामीण विकास विभाग और विश्व बैंक की मदद से शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य था – गाँव की महिलाओं को छोटेछोटे समूहों में जोड़ना, ताकि वे बचत और लोन की सुविधा से अपने पैरों पर खड़ी हो सकें।

शुरुआत में महिलाएं महज़ 10–20 हजार रुपये का लोन लेकर काम करती थीं। इनमें –

  • पशुपालन
  • सब्जी की खेती
  • हस्तशिल्प

जैसे छोटे कारोबार शामिल थे। धीरेधीरे इन समूहों ने ताकत पाई और आत्मविश्वास भी। यही वजह है कि आज यही महिलाएं कंपनियां बनाकर करोड़ों का कारोबार कर रही हैं।

सफलता की असली कहानी – मेहनत और लगन

जीविका के मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी हिमांशु शर्मा का कहना है कि, “शुरुआत भले ही दीदियों ने 10 हजार रुपये के छोटे लोन से की थी, लेकिन मेहनत और लगन से अब उन्होंने अपनी खुद की कंपनियां खड़ी कर ली हैं और पूरे देश में पहला स्थान हासिल किया है।”

आज यह महिलाएं सिर्फ व्यवसाय ही नहीं कर रहीं, बल्कि समाज में बदलाव की मिसाल भी पेश कर रही हैं। उन्होंने साबित कर दिया है कि अगर संकल्प मजबूत हो और साथ देने वाला प्लेटफ़ॉर्म मिल जाए, तो गाँव की महिलाएं भी देश की अर्थव्यवस्था को नई ऊँचाइयों तक ले जा सकती हैं।

बिहार की जीविका दीदियों की कहानी केवल कारोबार की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह महिलाओं की शक्ति, आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान का प्रतीक है। 2006 में एक छोटे से कदम के साथ शुरू हुई यह यात्रा आज 70 कंपनियों और 10 करोड़ से अधिक के कारोबार तक पहुँच चुकी है।

आज बिहार की महिलाएं पूरे देश के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। उनकी मेहनत, संघर्ष और हिम्मत ने साबित कर दिया है कि अगर मौका मिले तो कोई भी महिला सिर्फ गृहिणी नहीं, बल्कि एक सफल उद्यमी भी बन सकती है।

ALSO READ: Bihar Tourism: बिहार में अब मिलेगा ‘नाइट टूरिज्म’ का मजा! 4 करोड़ की लागत से बदलेगा राजगीर का नज़ारा

Bihar House Boat: अब बिहार में मिलेगा कश्मीर जैसे हाउसबोट का मज़ा

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *