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देश में लोकसभा चुनाव 2024 की तैयारियों को लेकर अब राजनीतिक पार्टियों की तरफ से लगातार बयान सामने आ रहे हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी एकता को लेकर हर कोई बोल रहा है. लेकिन इस एकता का सुत्रधार कौन बनेगा ये कोई कहने को तैयार नहीं है. दरअसर 2024 के लोकसभा चुनाव में मोदी के सामने कौन वह नेता होगा जो टक्कर दे सकता है इसको लेकर विपक्ष में मंथन चल रहा है. लेकिन राजनीतिक पार्टियों की तरफ से जो बयान सामने आ रहे हैं वह किसी भी सुरत में साकारात्मक नहीं है. इधर राहुल गांधी की भी भारत जोड़ों यात्रा समाप्त हो गई है. जिसमें उन्होंने दक्षिण से उत्तर तक की यात्रा की. कांग्रेस यह उम्मीद कर रही थी कि इस यात्रा के समाप्त होने के बाद देश के मोदी विरोधी नेताओं को एक मंच पर लाया जाएगा लेकिन कांग्रेस ऐसा करने में सफल न हो सकी और विपक्ष के बड़े चेहरे राहुल गांधी की इस रैली में शामिल नहीं हुए.

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आपको बता दें कि भारत जोड़ो यात्रा के समापन दिवस पर कांग्रेस देश के 22 राजनीतिक पार्टियों को एक मंच पर आने के लिए निमंत्रण दिया था. जिसमें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव, बीएसपी चीफ मायावती, शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे समेत देश के बड़े नेताओं को कश्मीर आने के लिए निमंत्रण दिया गया था. लेकिन बड़े नेताओं ने कांग्रेस की इस रैली में जाने से दूरी बना ली. बता दें कि इस मंच पर बीएसपी के एक नेता जरूर पहुंचे थे लेकिन उन्होंने मंच पर चढ़ते ही यह कह दिया कि हम पार्टी की तरफ से नहीं आए हैं हमारी व्यक्तिगत इच्छा है कि हम इस रैली में शामिल हों.

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देश में कई ऐसे राजनेता हैं जो यह चाहते हैं कि विपक्षी एकता मजबूत हो. विपक्ष एकसाथ होकर मोदी को टक्कर दे. लेकिन सभी नेताओं में आपसी सहमती नहीं बन पा रही है. इधर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी यह कहती है कि 2024 में बीजेपी को केंद्र की सत्ता से उखाड़ फेंकेंगे. लेकिन विपक्ष की तरफ से जो रैली बुलाई जाती है उसमें नहीं जाती है. या ये भी कह सकते हैं कि जब ममता विपक्ष को एकजुट करने के लिए नेताओं को बुलाती है तो उसमें नेता शामिल नहीं होते हैं. देश के राजनीतिकार तो यह भी कहते हैं कि असल में ममता बनर्जी चाहती है कि कांग्रेस को हटाकर बाहर कर दिया जाए.

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इधर अगर हम केसीआर के विपक्ष एकजुटता को देखें तो उसमें वे कांग्रेस को शामिल करना नहीं चाहते हैं. केसीआर का मानना है कि वे बिना कांग्रेस के एक मजबूत विपक्ष की बात कहते हैं. पिछले केसीआर के द्वारा बुलाई गई रैली में नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव को निमंत्रण ही नहीं दिया गया जिसके कारण वे इस रैली में शामिल नहीं हो सके. हालांकि बाद के समय में एक दूसरे कार्यक्रम में केसीआर ने नीतीश कुमार तेजस्वी को आमंत्रित किया है लेकिन नीतीश कुमार ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के जाने पर सहमती जता दी है. ऐसे में अब देखना है कि केसीआर का यह दाव देश की राजनीति में कितना सकारात्म रहने वाला है.

अब बात कर लेते हैं नीतीश कुमार के विपक्षी एकता को लेकर तो नीतीश कुमार का मानना है कि हम थर्ड फ्रंट नहीं मेन फ्रंट बनाना चाहते हैं. जिसमें सभी विपक्षी पार्टियां एक साथ होकर बीजेपी के खिलाफ मोर्चा खोले. पिछले दिनों जब नीतीश कुमार कांग्रेस प्रमुख रही सोनिया गांधी से मुलाकात करने गए थे तो सोनिया गांधी से उनकी मुलाकात नहीं हो पाई थी. हालांकि उसके बाद यह कहा जाने लगा था कि नीतीश कुमार के द्वारा चलाई इस मुहीम में कांग्रेस शामिल नहीं है. इतना ही नहीं नीतीश कुमार की तरफ से चलाई जा रही इस मुहुम से विपक्ष के कई नेताओं को यह लग रहा है कि नीतीश कुमार खुद प्रधानमंत्री पद के लिए ये सब कर रहे हैं. जबकि नीतीश कुमार का यह कहना है कि वे विपक्षी पार्टियों को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि बीजेपी के खिलाफ लड़ाई मजबूत हो सके. जबकि राजनीतिक जानकार यह मानते हैं कि ममता बनर्जी, केसीआर, केजरीवाल, अखिलेश यादव को यह लग रहा है कि नीतीश कुमार की इच्छा प्रधानमंत्री तक जाने की है. जिसके कारण वे नीतीश कुमार से दूरी बना रहे हैं. हालांकि जैसे जैसे चुनाव नजदीक आता जाएगा तब ही यह साफ हो पाएगा कि विपक्षी पार्टियों में कितनी एकटुटता बन पाती है. ये तो वहीं कहावत हो गई एगो अनार बा सभी लोग बीमार बा.

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