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क्या आपको भूतों में विश्वास है ? मुझे तो नहीं है क्यूंकि मैंने आज तक ना ही देखा है और ना ही महसूस किया है. ऐसे में भूत या फिर आत्मा पर विश्वास कर पाना थोड़ा मुश्किल है लेकिन ऐसी कहानियाँ सुनना कई लोगो को खूब पसंद होता है. आप भूत और आत्मा को लेकर क्या सोचते हैं हमें कमेन्ट सेक्शन में लिखकर जरुर बताएं? खैर आज हमलोग जिस सफ़र पर चलेंगे उसके बारे में अगर आप बिहारी हैं तो विस्तार में नहीं लेकिन संक्षिप्त में जरुर जानते होंगे. जो नहीं जानते उनके लिए हम हैं ना ! जी हाँ बिलकुल नमस्कार आप देख रहे हैं बिहारी न्यूज़ बिहारी विहार के इस सेगमेंट में आज हमलोग सफ़र करेंगे एक रहस्मयी भूतों के पहाड़ का. ये कुछ ज्यादा हो गया यूँ कहें की वो पहाड़ जहाँ आत्माओं का वास होता है. ये जानते हुए भी की वहां प्रेत आत्माएं होती हैं फिर भी हजारों नहीं बल्कि लाखों की संख्या में एक निश्चित समय में लोग वहां पहुँचते हैं. हालाँकि शाम होने से पहले वहां से वापस आ जाते हैं. पहाड़ से नीचे उतरने के दौरान पीछे मुड़ कर नहीं देखते नहीं तो ऐसा माना जाता है की आत्मा आपके पीछे लग सकती है. जी हाँ हम बात कर रहे राजधानी पटना से करीब 105 किलोमीटर दूर स्थित प्रेतशीला पर्वत की. नाम से ही समझ सकते हैं क्यूँ इस पर्वत का नाम प्रेत शीला पड़ा होगा. आमतौर पर लोग जानते हैं की गया जी जाकर पितरों को पितृपक्ष के दौरान पिंडदान करते हैं लेकिन आज हम इस प्रेतशीला पर्वत के रहस्यों को खंगालने की कोशिश करेंगे. अमूमन लोग यहाँ फल्गु नदी के किनारे तर्पण करने ही जाते हैं लेकिन हम आपके इस सफ़र को रोमांचक बनाने की कोशिश करेंगे.

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जिन्हें नहीं पता उन्हें बता दें की , प्रेतशिला पर्वत गया नगर से 8 किलोमीटर दूर स्थित एक ख़ास पर्वत है. वैसे तो गया के आसपास दर्जनों पर्वत है यूँ कहें तो गया नगर में कुल सात से आठ पर्वत विराजमान है. प्रेतशिला पर्वत इन्हीं में सबसे ऊंचा और प्राचीन पर्वत है. और यह गया नगरी के पुराने ऐतिहासिक पर्वतों में एक है. हिन्दू संस्कारों में पंचतीर्थ वेदी में प्रेतशिला की गणना की जाती है. शास्त्रों में पर्वत को प्रेतशिला के अलावा प्रेत पर्वत, प्रेतकला एवं प्रेतगिरि भी कहा जाता है. यह पर्वत करीब 876 फीट ऊंचा है जिसके तलहटी में कुछ ऐतिहासिक गांव भी बसे है. पर्वत के शिखर से नीचे का नजारा देखते ही बनता है. इस पर्वत पर चढ़ने के लिए सीढियाँ बनी हुई है जो की कुल 676 सीढियां हैं लेकिन अगर आप अपने इस सफ़र को और रोमांचक बनाना चाहते हैं तो आप इस पर्वत की ट्रेकिंग कर सकते हैं.

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प्रेतशीला एक अद्भुत और अविश्वसनीय पर्वत में से एक है. जो अपने अनादर कई रहस्यों को छुपाए हुए रखा है. इस प्रेतशीला पहाड़ और गया जी का वर्णन वायु पुरान और गरुड़ पुराण में भी मिलता है. इससे आप अनुमान लगा सकते हैं की यह पर्वत अपने आप में कितना महत्वपूर्ण और कितना प्राचीन है. गरुड़ पुराण के पौराणिक गाथा के अनुसार एकबार गयासुर नाम का एक राक्षस ब्रम्हा जी को अपने तपस्या के बल पर खुश कर लेता है इस दौरान ब्रम्हा जी, गयासुर से वरदान मांगने को कहते हैं तभी गयासुर ने ब्रम्हा जी से कहा की मुझे ऐसा वरदान दें की मेरे darshan या स्पर्श मात्र से लोगो को मोक्ष की प्राप्ति हो जाए. और उसे यमलोक ना जाना पड़े. ब्रम्हा जी ने गयासुर को ये वरदान दे दिया जिसके बाद गयासुर समस्त पृथ्वीलोक में घुमघुम कर पापियों का उद्धार करना शुरू कर दिया. जिसके बाद अब सभी पापी विष्णुलोक जा रहे थे इस बीच यमराज की व्यवस्था में गड़बड़ियां शुरू हो गयी. यमलोक सुना पड़ने लगा. ऐसे में यमराज ब्रम्हा जी के पास जाते हैं और इस समस्या का सुझाव मांगते हैं तभी ब्रम्हा विष्णु और महेश मिलकर एक नीति बनाई और गयासुर से कहा की तुम अनंत पवित्र हो इसलिए भगवान विष्णु चाहते हैं की ये तुम्हारे पेट पर यज्ञ करें. और गयासुर भी मान जाता है. जब यज्ञ संपन्न हुआ और गयासुर चलने फिरने में असमर्थ हो गया तभी भगवान विष्णु ने गयासुर के उपर अपना पैर रखकर उसे अचल कर दिया इतना ही नहीं गयासुर के ऊपर एक शिला यानी पत्थर रख दिया यही वो प्रेतशीला है इतना कुछ होने के बाद भी गयासुर भगवान का सुमिरन करता रहा. गयासुर के इस समर्पण को देखकर एकबार फिर ब्रम्हा जी अतिप्रसन्न हुए और वरदान दिया और कहा की अब से यह स्थान जहाँ तुम्हारे पीठ पर यज्ञ हुआ है. वो स्थान गया के नाम से जाना जाएगा. इस स्थान पर जो भी पिंडदान व श्राद्ध करेगा उनका मैं उद्धार करूँगा.

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ऐसी मान्यता है कि यहां उन्होंने श्रीराम ने अपने पिता राजा दशरथ का श्राद्ध किया था. वही ऊपर में यमराज का मंदिर है. के शिखर पर एक शिला है जिसमें दरारें हैं लोगो की मान्यता है की यही से पृथ्वी लोक और परलोक की कड़ियाँ जुडती हैं और प्रेत आत्मा इसी के माध्यम से पृत्वी लोक आते हैं और वापस अपने लोक को पहुँचते हैं. सीढियों पर चढ़ने में असमर्थ लोग पालकी वाले का सहारा लेकर ऊपर जाते हैं. यहाँ सूर्य, विष्णु, महिषासुर मर्दिनी, दुर्गा, शिवपार्वती तथा अन्य ब्राह्मण संप्रदाय से संबंधित केन्द्र स्थल माना जाता है. इसी के नीचे राम कुण्ड है जिसके बारे में कहा जाता है कि श्रीराम ने इसी कुंड में स्नान किया था. प्रेतशिला के नीचे ब्रहम कुण्ड है जिसके बारे में कहा जाता है कि इसका प्रथम संस्कार ब्रहमा जी द्वारा किया गया था. वैसे तो सालों भर यहां तीर्थयात्री आते रहतें है. पर हर साल पितृपक्ष समागम में यहां जुटने वाली भीड़ से पन्द्रह दिनों का मेला लगता है. जिसे पितृपक्ष मेला कहा जाता है. यह मेला विश्व प्रसिद्द है. इसका विशेष महत्त्व है. प्रेतशिला पर्वत पर चने के सत्तू से पिण्डदान करने की पुरानी परम्परा है. यह सदियों से चली आ रही एक परंपरा है और लोगों का मानना है की इस जगह पे पूजा करने के बाद आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है. लोगो का यह मानना है की जिनकी आकस्मिक मृत्यु हो जाती है वो उस इन्सान का यहाँ पिंडदान करते हैं औ उनकी तस्वीर यह्नी ख़ास स्थल पर छोड़ जाते हैं. ताकि असमय मरने वाले की आत्मा इधर उधर ना भटके. इस कारण हर वर्ष पितृपक्ष के दौरान गया शहर के प्रेतशीला पर्वत पर देशविदेश से आए हजारों पिंडदानियों का तांता लग जाता है. यहाँ आने वाले लोग बताते हैं की यहाँ आकर एक अलग एक नई उर्जा समाहित हो जाती है. अगर आप भी ऐसे रहस्यों को खंगालने के शौक़ीन हैं तो कभी आएं बिहार स्थित गया शहर के प्रेतशीला पर्वत पर.

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