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बुनकर कपिलदेव प्रसाद जो की बिहार राज्य के बिहारशरीफ जिले के हीं गाँव बसवनबिगहा के रहने वाले हैं हैं उन्हें गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर पद्म श्री से सम्मानित की जाने की सूचना मिली है. जैसे हीं पद्म श्री मिलने की सूचना उन तक पहुंची तो पूरे परिवार में ख़ुशी का माहौल बन गया. उनके परिवार के साथसाथ पूरे गाँव भर के लोग झूम उठे. बताते चलें की कपिलदेव प्रसाद को यह सम्मान बावनबूटी साड़ी के निर्माण के लिए दिया गया है. उनके इस सम्मान की सराहना के लिए जिला प्रशासन द्वारा भी उन्हें गणतंत्र दिवस के अवसर पर सोगरा विद्यालय में मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया है. जिला प्रशासन द्वारा कॉल कर के उन्हें यह आमन्त्रण दिया गया. यहाँ होने वाले कार्यक्रम में उन्हें उनकी इस सफलता के लिए सम्मानित भी किया जाना है. मिली जानकारी के अनुसार उन्हें यह सम्मान मार्च के महीने में दिल्ली में मिलेगा. उन्होंने अपने कारोबार के बारे में बात करते हुए बताया की वह पिछले 60 वर्षों से सूत कटाई और बावनबूटी साड़ी के निर्माण से जुड़े हैं. आगे उन्होंने बताया की उनका यह काम पुश्तैनी है. दरअसल इस कारोबार से उनके पिता भी जुड़े हुए थे. साथ हीं साथ उन्होंने यह भी कहा की उनका इकलौता बेटा और उनकी पत्नी लाखो देवी भी उनके इस काम में हाथ बटाते हैं.

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बता दें की यहीं वो जिला हैं जहाँ प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय है और यह अपने गौरवपूर्ण इतिहास के लिए केवल राज्य और देश हीं नहीं बल्कि पूरे विश्व में जाना जाता है. नालंदा विश्वविद्यालय के अलावे और भी कई ऐसे ऐतिहासिक स्थल और वैभवशाली लोग हैं जिनकी ख्याति हर जगह है. कपिलदेव प्रसाद भी उन्हीं में से एक हो गये हैं. उन्होंने भी अपना नाम इसी सूचि में दर्ज कर लिया है. गौरतलब है की बावनबूटी हस्तशिल्प कला नालंदा के हस्तकरघों में बुनी जाने वाली काफी लोकप्रिय हस्तशिल्प कला है. लेकिन इस कला के बारे में शायद हीं किसी को मालुम है. इस कला के बारे में कम लोगों को जानकारी होने की एक वजह यह भी है की इस पर आधुनिक फैशन की परत हीं नहीं चढ़ पाई. लेकिन बता दें की हाथ से की गयी यह हश्तकला देश के किसी विरासत से कम नहीं है. जिसे कपिलदेव प्रसाद और उनके परिवार ने अभी तक जीवित रखा है. बता दें की इस साड़ी पर साधारण कॉटन और तसर के कपड़े से कारीगरी की जाती है.

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नालंदा के नेपुरा गाँव में बौद्ध धर्म का प्रचार करने वाली इस साड़ी को सदियों से बनाया जा रहा है. पूरे साड़ी में एक जैसी बावन बूटियां यानी मौटिफ होती है इसलिए इसे बावनबूटी साड़ी कहा जाता है. साड़ी दिखने में एकदम हीं साधारण सी लगती है और काफी उम्दा सी स्टाइल देती है. साथ हीं साथ पहनने में भी यह साड़ी काफी आरामदायक सी होती है. इसे महिलायें किसी भी पूजापाठ में, किसी त्यौहार में या किसी छोटेमोटे अवसर पर आसानी से पहन सकती है. मालूम हो की इस साड़ी को हस्तकरघे से तैयार किया जाता है. इस साड़ी पर किसी खास चिन्ह का निर्माण 52 जगहों पर किया जाता है. इस साड़ी की यहीं खासियत होती है. वैसे इस साड़ी में और भी कई ऐसे वैरायटी हैं जो आपको मिल जाएंगे. इसकी कीमत लगभग 2 हजार से लेकर 20 हजार तक की भी होती है. इस साड़ी की मांग केवल हमारे राज्य और देश में हीं नहीं विदेशों में भी है. बौद्ध धर्म की झलक भी इस साड़ी में देखने को मिलती है. हो भी क्यों ना आखिर बौद्ध धर्म की शुरुआत भी तो बिहार से हीं हुई थी. दरअसल इस साड़ी में बौद्ध धर्म की कलाकृतियों को उकेरा जाता है. यह कलाकृति ब्रह्माण्ड के खूबसूरती को दर्शाती है. बता दें की इन बावन बूटियों में धर्म का पहिया, फूलदान, शंख, बोधि वृक्ष, सुनहरी मछली, कमल के फुल जैसी कलाकृतियों को भी उकेरा जाता है. बौद्ध धर्म के अनुयायी इस हस्तकला का काफी सम्मान करते हैं. उम्मीद की जा रही है की फैशन की दुनिया में जल्द हीं इस कला की पहचान होगी. क्योंकि अभी तक इस कला को और कारीगरों को लोगों के द्वारा राष्ट्रिय स्तर पर खूब सराहना मिला है.

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