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पूरी दुनिया ने साल 2023 का स्वागत करते हुए वर्ष 2022 को अलविदा कर दिया है. प्रत्येक वर्ष 1 जनवरी को नए साल की शुरुआत हम ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार करते हैं. इस कैलेंडर की मान्यता 200 से भी अधिक देशों में हैं. अर्थात उन देशों में चल रहे सरकारी या अन्य कामकाज इसी कैलेंडर के आधार पर जनवरी महीने से शुरू होकर दिसम्बर माह तक चलते है. यहाँ तक की हमारा देश भारत जिसने विक्रम संवत कैलेंडर की रचना की वह भी ग्रेगोरियन कैलेंडर को ही सबसे पहले प्राथमिकता देता है. लेकिन पूरी दुनिया में एक ऐसा देश भी है जो भारत के विक्रम संवत कैलेंडर को भी मान्यता देता है, वो है हमारा पड़ोसी देश नेपाल. आपको बता दें की विक्रम संवत कैलेंडर एक हिन्दू कैलेंडर है. नेपाल में सारे कामकाज को हिन्दू कैलेंडर के हिसाब से ही किया जाता है. इसलिए यह नेपाल का आधिकारिक कैलेंडर है.

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नेपाल में इसकी शुरुआत;

आइये अब अपनी चर्चा को आगे बढ़ाते हुए हम बात करते हैं नेपाल में इसके शुरुआत की. आपको बता दें की विक्रम संवत कैलेंडर का उपयोग नेपाल में आधिकारिक तौर पर वर्ष 1901 ईस्वी में शुरू किया गया. इस कैलेंडर को नेपाल के राणा वंश ने आधिकारिक रूप से स्वीकृति दी. इस कैलेंडर के अनुसार नए वर्ष की शुरुआत बैशाख महीने के पहले दिन से शुरू होती है. यदि हम ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार बैशाख महीने को देखे तो यह लगभग 13 से 15 अप्रैल के बीच होगा. वहीँ चैत्र महीने के आखिरी दिन के साथ इसकी समाप्ति होती है. नए साल के पहले दिन यानि बैसाख महीने के पहले दिन नेपाल में सार्वजनिक अवकाश घोषित रहता है. आपको बता दें की पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु की सरकार ने वर्ष 1954 में विक्रम संवत कैलेंडर को ग्रेगोरियन फॉर्मेट के साथ अपना लिया था. लेकिन देश के सरकारी कामकाज को ग्रेगोरियन कैलेंडर के आधार पर ही किया जाता है. विक्रम संवत कैलेंडर को विक्रमी कैलेंडर भी कहते हैं. भारतीय उपमहाद्वीप में लगभग 57 ईसा पूर्व से ही दिनांक और समय के आंकलन के लिए विक्रम संवत कैलेंडर का प्रयोग किया जा रहा है. आपको बता दें की भारत में कई ऐसे ग्रामीण इलाकें भी हैं जहाँ इस कैलेंडर का प्रयोग किया जाता है. विक्रम संवत कैलेंडर से पहले सप्तऋषि और इससे भी पहले द्वापर युग में श्री कृष्ण संवत का प्रयोग होता था.

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हिन्दू कैलेंडर अर्थात विक्रम संवत कैलेंडर की शुरुआत;

आइये अब हम चर्चा करते हैं विक्रम संवत कैलेंडर के बारे में. इस कैलेंडर का पहला शब्द राजा विक्रमादित्य के नाम पर रखा गया था. वहीँ इसमें संवत शब्द का प्रयोग संस्कृत में वर्ष को दर्शाने के लिए किया जाता है. आपको बता दें की राजा विक्रमादित्य का जन्म 102 ईस्वी पूर्व में और मृत्यु 15 ईस्वी के समय हुआ था. राजा विक्रमादित्य ने देशवासियों को 57 ईस्वी पूर्व में भारतवर्ष के देशवासियों को शकों के अत्याचार से मुक्त करवा कर विजय हासिल की थी. इसी विजय के स्मृति में चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से इस कैलेंडर की यानि विक्रम संवत की शुरुआत हुई. ग्रेगोरियन कैलेंडर के ही सामान इसमें भी 7 दिनों का एक सप्ताह और 12 महीनों का 1 साल होता है. लेकिन इसमें 12 महीने का निर्धारण 12 राशियों के आधार पर किया गया है. पूर्णिमा यानि जिस दिन पूर्ण चन्द्रमा होती है, और यह चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उसी के आधार पर इसके महीनों का नामकरण होता है. इसमें चन्द्र वर्ष सौर वर्ष से 11 दिन 3 घटी और 48 पल छोटा है, इसलिए हर 3 वर्षों में इसमें 1 महिना जोड़ दिया जाता है. आपको बता दें की इस संवत की शुरुआत गुजरात में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से और वहीँ उत्तरी भारत में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से माना जाता है. इसमें महीने का हिसाब सूर्य और चाँद की गति को देख कर किया जाता है.

हिन्दुओं के लिए विक्रम संवत की महत्वता;

आपको बता दें की विक्रम संवत में कई ऐसी चीजें उपलब्ध हैं जो हिन्दुओं के लिए अंग्रेजी कैलेंडर की तुलना में ज्यादा महत्वपूर्ण है. जैसे शुभ और अशुभ योग की जानकारी, सूर्य और चंद्र ग्रहण, तीज त्यौहार के मुहूर्त, शादीविवाह, जन्म कुंडली और श्राद्धकर्म आदि हिंदी पंचांग के गणना के आधार पर ही तय किया जाता है. इसी पंचांग से हर एक शुभ और अशुभ मुहूर्त के बारे में पता चलता है. आपको बता दें की हिन्दू कैलेंडर के अनुसार इस बार नया साल 12 महीने की बजाय 13 महीने का भी हो सकता है. दरसल इसकी वजह अधिमास है. इस बार श्रावन महिना 30 दिनों का नहीं बल्कि 59 दिनों का होगा. ऐसे में सावन माह में 8 सोमवार पड़ेंगे.

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