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जब आपसे कोई यह पुछे की आपके जीवन में 20 रुपये की क्या अहमियत है तो आप कहेंगे की हम तो इतना पैसा किसी को टिप के रूप में दे देते हैं. इस मसले पर हर किसी के अपने अपने विचार होंगे लेकिन इसी 20 रुपये के चलते मथुरा के रहने वाले वकील साहव ने पूरे 22 सालों तक की कानूनी लड़ाई लड़ी और आखिर में इंसाफ भी मिला. मीडिया से बात करते हुए Tungnath Chaturvedi ने बताया कि यह सिर्फ 20 रुपये की बात नहीं है बल्कि यह भ्रष्टाचार को हराकर इंसाफ की जीत है. तो चलिए इस पूरी घटना को तास के पत्तों की तरह खोलते हैं और एक एक कड़ी को जोड़ते हुए पूरी कहानी को समझते हैं.

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दे बेटर इंडिया से बात करते हुए तुंगनाथ चतुर्वेदी ने बताया कि यह बात 20 रुपये की नहीं है बल्कि इंसाफ की थी. उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार को कोई एक दिन खत्म नहीं कर सकता है. लेकिन किसी को भी शुरुआत करना होगी. कोई तो लोगों में इसके खिलाफ जागरुकता लगाएगा. अगर मेरी लड़ाई में कोई एक भी आदमी न्याय के प्रति जागरुक होता है तो मैं समझूंगा कि मुझे सही से न्याय मिल गया. साल 1999 के दिनों को याद करते हुए कहा कि मुझे मुरादाबाद जाना था. और उन्होंने मथुरा कैंट रेलवे स्टेशन से दो टिकट खरीदी एक टिकट का दाम था 35 रुपये यानी की इस हिसाब से 70 रुपये हुए लेकिन काउंटर पर बुकिंग कलर्क ने उनसे 90 रुपये की मांग की. आगे उन्होंने बताया कि मैंने जब 20 रुपये की मांग की तो उन्होने देने में आनाकानी कर दिया. हम दोनों के बीच में स्टेशन पर काफी बहस हुआ इसी बीच हमारी ट्रेन आ गई और हम ट्रेन पकड़ कर अपने गंतव्य की ओर चल दिए.

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उन्होंने आगे के बारे में बताते हुए कहा कि मैं भले ही ट्रेन में बैठ गया था लेकिन बार बार मेरे दिमाग में वहीं घटना याद आ रही थी जिस तरह से काउंटर से 20 रुपये ज्यादा लिए गए थे वह एक अवैध वसूली की तरह था. एक तरह से कहें तो यह सीधा सीधा भ्रष्ट्रचार का मामला था. उन्होंने कहा कि कोई और होता तो इस मसले पर उसे जाने देता. लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया. मुझे मेरे हक के पैसे नहीं लाएं गए, यह मेरे स्वाभिमान पर भी चोट थी. मैंने बहुत सोच-समझकर इसके खिलाफ इंसाफ की लड़ाई लड़ने का फैसला लिया. उन्होंने कहा कि सबसे पहले वे मथुरा स्टेशन मास्टर से मिले लेकिन उन्हें वहां से मदद नहीं मिली. इसके बाद वे उत्तर-पूर्व रेलवे गोरखपुर के महाप्रबंधक के पास मथुरा रेलवे स्टेशन पर बिंडो बुकिंग कलर्क के खिलाफ कन्जूमर फोरम में केस दर्ज किया. केस दर्ज होने के बाद कई तरह की परेशानियां सामने आती रही. कभी कोर्ट में विपक्षी पार्टी नहीं पहुंच पाता तो कभी कोर्ट बंद रहता तो कभी वकील का हड़ताल रहता तो कभी कुछ कभी कुछ लेकिन तुंगनात पेशे से वकील थे इसीलिए लिए इतने दिनों तक उन्होंने इस केस को लड़ा. और भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत दिखाई. कंस्यूमर फोरम में चल रहा यह केस 22 साल तक चलता रहा. और अंतिम में यह फैसला तुंगनाथ चतुर्वेदी के पक्ष में आया. कोर्ट ने मानसिक, आर्थिक खर्चों के लिए 20 रुपये प्रतिवर्ष 12 फीसदी ब्याज के सात 15 हजार रुपये जुर्माना देने का आदेश जारी कर दिया. साथ ही रेलवे को इस बात भी निर्देश दिया गया कि यह राशि 30 दिन के अंदर भुगतान होनी चाहिए. अगर भुगतान नहीं होती है तो यह राशि और भी बढ़ सकती है.

 

तुंगनाथ ने बताया कि जब उन्होंने केस दर्ज किया था तो उस समय उनकी उम्र 45 साल थी जब कोर्ट का फैसला सामने आया है तो उस समय उनकी उम्र 67 साल थी. तुंगनाथ ने बताया कि रेलवे से जुर्माने के जितने भी पैसे मिलेंगे, मैं उसे प्रधानमंत्री राहत कोष में दे दूंगा. उन्होंने आखिरी में कहा कि सच तो यह है कि मैंने कभी पैसा नहीं चाहा था, बस इस लड़ाई में मेरा समय और एनर्जी बहुत खर्च हुई है. उन्होंने रेलवे के इस फैसले के खिलाफ अपील भी कर सकता है अगर ऐसा होता है तो हम इंसाफ के लिे आगे की लड़ाई लड़ने को तैयार हैं.

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