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Court Rules: जब भी कोई पहली बार अदालत की चौखट पर कदम रखता है, तो माहौल ही कुछ अलग होता है। एक अलग सी गंभीरता, एक ठहराव और एक ऐसा अनुशासन जो शायद कहीं और नहीं दिखता। कोर्ट कोई टीवी सीरियल का सीन नहीं है जहाँ बहसें चिल्लाकर होती हैं और गवाह डायलॉगबाज़ी करते हैं। असल ज़िंदगी की अदालत में हर एक बात का वजन होता है और हर गलती की कीमत।

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अब सोचिए, आप जज के सामने खड़े हैं और अचानक बहस करने लगें या ऊंची आवाज़ में बोलने लगें – अरे भाई, ये तो सीधेसीधे खुद की कब्र खुद खोदने जैसा है! अदालत में जज सिर्फ एक व्यक्ति नहीं होता, वो उस पूरे सिस्टम की गरिमा का प्रतिनिधित्व करता है। जरा सी भी बदतमीजी या बहसबाज़ी को कोर्ट की अवमानना यानी “Contempt of Court” माना जाता है। और यकीन मानिए, जज साहब के पास ना वक्त की कमी होती है, ना ही शक्तियों की – एक झटके में जुर्माना या जेल की सजा भी सुना सकते हैं।

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अब एक और बहुत ही खतरनाक गलती – झूठ बोलना! जी हां, अगर आप गवाही देने के लिए बुलाए गए हैं, तो सच्चाई से न डिगें। झूठ बोलना या फर्जी दस्तावेज़ पेश करना ‘Perjury'(पजरि) कहलाता है। कानून की नजर में ये गुनाह इतना बड़ा है कि इसकी सजा सीधे 7 साल तक की जेल हो सकती है। सोचिए, एक झूठ आपको सालों के लिए सलाखों के पीछे पहुंचा सकता है।

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कोर्ट में एक और नियम जो हर किसी को गांठ बांध लेना चाहिए – बोलने से पहले सोचना और इजाज़त लेना। वहाँ आप अपने घर की बैठक में नहीं बैठे होते जहाँ जब मन किया बोल पड़े। कोर्ट में आपको तभी बोलना चाहिए जब जज या आपका वकील आपको अनुमति दे। बिना परमिशन कुछ भी बोलना न सिर्फ बदतमीज़ी मानी जाती है, बल्कि आपके केस को भी नुकसान पहुँचा सकता है।

और हाँ, मोबाइल फोन! आजकल ये तो सबकी जान बन चुका है, लेकिन अदालत में इसकी कोई जगह नहीं। अगर आपका फोन कोर्ट की कार्यवाही के दौरान बज उठा, तो समझिए आपकी इज़्ज़त के साथसाथ आपका फोन भी ज़ब्त हो सकता है। ऊपर से जुर्माना अलग! कोर्ट में मोबाइल साइलेंट मोड में नहीं, स्विच ऑफ मोड में होना चाहिए।

सबसे ज़रूरी बात – कोर्ट में किसी को धमकाना, चाहे वो वकील हो, गवाह हो या कोई और – ये न सिर्फ गैरकानूनी है बल्कि बेहद मूर्खता भरा कदम भी है। कोर्ट में हर किसी को सुरक्षा और सम्मान का अधिकार होता है। ऐसा कोई भी व्यवहार सीधे आपको जेल तक पहुंचा सकता है।

कोर्ट में पेश होना मतलब सिर्फ केस लड़ना नहीं, बल्कि एक बहुत ही अनुशासित और गरिमामयी प्रक्रिया का हिस्सा बनना है। जरा सी लापरवाही न सिर्फ आपके केस को बिगाड़ सकती है, बल्कि आपकी ज़िंदगी भी। तो अगर आप कभी अदालत जाएं, तो खुद को एक ज़िम्मेदार नागरिक की तरह पेश करें – विनम्र, संयमित और पूरी तैयारी के साथ।

वरना क्या होगा?
सिर्फ पछतावा… और शायद कुछ साल जेल में भी सोचने का वक्त।

क्या आप जानते थे कि सिर्फ फोन बजने से भी कोर्ट में जुर्माना लग सकता है?

 

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