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ॐ सर्वस्वरूपे सर्वेसे सर्वशक्ति समन्विते भये भयस्त्रही नौ देवी दुर्गे देवि नमोस्तुते

अर्थात कहा जाता है की सभी स्वरूपों में माता ही हैं, सभी की ईश्वरी मां हैं, तथा सब प्रकार की शक्तियां उनमें ही समन्वय पाती हैं, सर्वशक्ति सम्पन्न दिव्यरूपा, हे मां दुर्गे ! सब भयों से हमारी रक्षा करिए , सभी आपदाएं दूर करिए. नमस्कार आप देख से रहे हैं बिहारी न्यूज़ बिहारी विहार के आज के इस सेगमेंट में हम आपको लेकर चलेंगे राजधानी पटना स्थित अखंडवासिनी मंदिर जिसे मनोकामना मंदिर भी कहते हैं. इस मंदिर की एक ख़ास बात आपको हैरान कर देगी वो ये है की माँ के समक्ष जलने वाला ज्योत करीब 100 सालों से निरंतर जल रहा है. इसके पीछे की आख्यान क्या है? यह मंदिर इतना क्यों प्रसिद्द है की दूर दूर से लोग यहाँ पूजा करने आते हैं. हम ये सभी बातें आपके साथ साझा करेंगे.

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कहते हैं मन एक मंदिर है जहाँ ईश्वर सद्गुणों के रूप में प्रकट होते हैं. हमारी भारतीय संस्कृति की आत्मा है. अखंडवासिनी मंदिर, जहाँ नियमित माँ दुर्गा की पूजा की जाती है. यहाँ 100 साल से भी ज्यादा समय से पूजा की जाती है. कहा जाता है की जहाँ ईश्वर की अखंड पूजा होती है वहां शक्ति का वास होता है; स्मरण मात्र से जीवों का कल्याण हो जाता है. भक्त भावनाओं से भक्ति से सराबोर होकर मंदिरों में अपनी श्रद्धा के रूप में फल फूल चुनरी आदि चढाते हैं.

राजधानी पटना में गोलघर के पास स्थित माँ अखंडवासिनी मंदिर करीब 150 साल पुराना है यह मंदिर कई मायनों में ख़ास है. पहला ये की इस मंदिर में माँ दुर्गा के सामने जलने वाला ज्योत करीब 110 सालों से निरंतर जल रहा है. दूसरा ये की माँ के चढ़ावे में हल्दी ख़ास मायने रखता है. यहाँ मंगलवार के दिन काफी संख्या में लोग अपनी मुरादे लेकर माँ की पूजा अर्चना के लिए आते हैं.

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कहा जाता है की माँ अखंडवासिनि मंदिर की स्थापना पिछले 150 साल पहले हुई थी. कहा ये भी जाता है की अंग्रेजों के आतंक से बचने के लिए इस मंदिर को बनाया गया था. कहा जाता है की इस मंदिर में जो कोई भी सच्चे मन से मनोकामना लेकर आता है वो अवश्य पूर्ण होती है इसलिए इस मंदिर को मनोकामना मंदिर भी कहते हैं. माँ के चढ़ावे में खड़ी हल्दी और उड्हुल का फूल चढ़ाते हैं जिनकी भी मन्नत पूरी होती है, वो अपनी सुविधानुसार घी और तेल का दीया जलाते हैं. क्यूंकि मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता 110 वर्षों से यहाँ जल रहा अकह्न्द ज्योत है यहाँ दो दिए जल रहे हैं. एक घी तथा दुसरा सरसों तेल का. मान्यता है की घी का दया घर में सुख शांति यश और वैभव के लिए तो वहीँ सरसों तेल का दिया शत्रुयों के नाश के लिए जलाया जाता है. जिनकी भी मन्नत यहाँ पूरी होती है वो यथासंभव दीया जलाते हैं और चढ़ाव चढाते हैं. नवरात्र के मौके पर भी घी या तेल के नौ दीपक जलाने की परंपरा है. नवरात्र के नौवे दिन माँ के प्रांगन में भव्य भंडारा किया जाता है. और हलवा पूरी बांटा जाता है. नवरात्र के मौके पर मंदिर में विशेष भीड़ होती है. वहीँ सप्ताह के हर मंगलवार को यहाँ भक्तों की भीड़ होती है.

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