Bihar news: स्वच्छता, तकनीक और आत्मनिर्भरता—इन तीनों का संगम अगर कहीं एक साथ देखने को मिल रहा है, तो वह है बिहार का सिवान जिला। यहां नौतन प्रखंड की लखवा ग्राम पंचायत ने देशभर के लिए एक नई और प्रेरक मिसाल पेश की है। लखवा गांव देश का पहला ऐसा गांव बन गया है, जहां घरों से निकलने वाले कचरे की खरीद–बिक्री मोबाइल एप के माध्यम से की जा रही है। यह पहल न सिर्फ ग्रामीण स्वच्छता को नई दिशा दे रही है, बल्कि कचरे को आर्थिक संसाधन में बदलकर ग्रामीणों की आमदनी भी बढ़ा रही है।

यह अभिनव प्रयोग मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुवाई में चल रहे लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान (LSBA) के तहत शुरू किया गया है। इस अभियान का उद्देश्य केवल सफाई तक सीमित नहीं है, बल्कि ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन के जरिए पर्यावरण संरक्षण, तकनीकी नवाचार और ग्रामीण आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना भी है। लखवा गांव में शुरू की गई यह व्यवस्था अब एक प्रभावी मॉडल के रूप में उभरकर सामने आई है।
इस मॉडल की सबसे खास बात यह है कि घरेलू कचरे को अब बोझ नहीं, बल्कि मूल्यवान संसाधन के रूप में देखा जा रहा है। गांव के लोग ‘कबाड़ मंडी’ नामक मोबाइल एप का उपयोग कर अपने घरों से निकलने वाले कचरे का विवरण दर्ज करते हैं। इसमें प्लास्टिक, कागज, गत्ता, टीन जैसे विभिन्न प्रकार के कचरे की जानकारी दी जाती है। एप पर उपलब्ध इस जानकारी के आधार पर अधिकृत एजेंसी असराज स्क्रैप सॉल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड तय समय पर घर पहुंचती है।
एजेंसी के कर्मचारी मौके पर ही कचरे का वजन करते हैं और पहले से निर्धारित दर के अनुसार ग्रामीणों को भुगतान किया जाता है। पूरी प्रक्रिया डिजिटल होने के कारण न सिर्फ पारदर्शिता बनी रहती है, बल्कि समय की भी बचत होती है। कचरा संग्रहण से लेकर भुगतान तक का यह सिस्टम ग्रामीणों के बीच भरोसे और सहभागिता को मजबूत कर रहा है।

इस व्यवस्था में हर प्रकार के कचरे की स्पष्ट कीमत तय की गई है। प्लास्टिक बोतल 15 रुपये प्रति किलोग्राम, काला प्लास्टिक 2 रुपये, सफेद मिक्स प्लास्टिक 5 रुपये, बड़ा गत्ता 8 रुपये, मध्यम गत्ता 6 रुपये, छोटा गत्ता 4 रुपये, कागज 3 रुपये और टीन 10 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से खरीदा जा रहा है। इन दरों के चलते ग्रामीणों में घर के स्तर पर ही कचरे को अलग–अलग करने की आदत तेजी से बढ़ी है।
लखवा गांव से एकत्रित किया गया कचरा सीधे प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट (PWMU) और वेस्ट प्रोसेसिंग यूनिट (WPU) तक भेजा जाता है। यहां वैज्ञानिक तरीकों से इसका प्रसंस्करण किया जाता है। सिंगल यूज प्लास्टिक, नूडल्स रैपर और अन्य अपशिष्ट से लैपटॉप बैग, बोतल बैग, कैरी बैग, लेडीज पर्स, डायरी, चाबी रिंग, अलमारी और बेंच जैसे उपयोगी व टिकाऊ उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं।
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इस पूरी प्रक्रिया का सबसे बड़ा लाभ यह है कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाला कचरा दोबारा उपयोग में लाया जा रहा है। इससे प्लास्टिक प्रदूषण में कमी आ रही है और गांवों की स्वच्छता बेहतर हो रही है। साथ ही, स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो रहे हैं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है।

उल्लेखनीय है कि लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत पूरे राज्य में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को लेकर बड़े पैमाने पर काम हुआ है। वर्तमान में बिहार में 171 प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट स्थापित की जा चुकी हैं। इन इकाइयों के माध्यम से हजारों टन सिंगल यूज प्लास्टिक का वैज्ञानिक निस्तारण किया जा रहा है।
लखवा ग्राम पंचायत की यह पहल साबित करती है कि अगर सही नीति, तकनीक और जनभागीदारी हो, तो गांव भी नवाचार के केंद्र बन सकते हैं। यह मॉडल न केवल बिहार, बल्कि पूरे देश के ग्रामीण इलाकों के लिए एक प्रेरणास्रोत है, जहां स्वच्छता के साथ–साथ रोजगार और आत्मनिर्भरता का रास्ता खुलता है।
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