Sawan: सावन का पवित्र महीना चल रहा है। समस्त हिंदू जगत भगवान शिव की पूजा अर्चना आराधना में जुटा हुआ हैै। सोमवारी व्रत की तैयारियां हो रही है। हर हर महादेव के जयघोष से जगत गूंज रहा है। भोजन, जीवन, आचार, विचार, व्यवहार सब कुछ शुद्ध हो रहा है। यही तो हमारे सनातन की सुंदरता है जहां हर धार्मिक तिथि पर मांसाहार को पूर्ण रुप से वर्जित कर दिया जाता हैै।
कभी अभी आपके मन में आता होगा कि आखिर सावन के महीने में मांस, मछली, अंडा, शराब, प्याज और लहसुन का सेवन हिंदू धर्म में क्यों मना है। आइए, आपको इसके पीछे के कारणों पर आज चर्चा करते हैं।

पहली वजह…धार्मिक मान्यता...हिंदू धर्म में सावन को भगवान शंकर को समर्पित माना जाता है। इस दौरान अनादिकाल से जीव हत्या नहीं करने, सात्विक और शुद्ध भोजन करने, सबके प्रति दयाभाव रखने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यही वजह है कि हर सच्चा हिंदू इस दौरान मांस, मछली, अंडे, शराब और प्याज लहसुन जैसे तामसिक पदार्थों से दूर रहता है।
दूसरा कारण….प्रकृति और जीवों के प्रति हमारी जिम्मेदारी… सनातन धर्म की कोई भी मान्यता अकारण नहीं है। इसके पीछे तर्क और विज्ञान छिपा हुआ है। आपको मालूम है कि सावन का महीना बारिश का महीना होता है। इस मौसम में जीव जंतुओं और मछलियों का प्रजनन काल होता है। इस दौरान अगर मनुष्य उन्हें खाएगा और उनका शिकार करेगा तो उनके अस्तित्व पर ही संकट आ जाएगां यही वजह है कि हमारे धर्म में सावन के महीने में मांसाहार पर पूर्ण प्रतिबंध है। ?
अब आपको इसके पीछे की तीसरी वजह बताते हैं। आयुर्वेद के अनुसार बरसात के दिनों में हमारी पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है। ऐसे में समय में डॉक्टर भी हमंे तेल मसाले, भारी और देर से पचने वाले भोजन से दूर रहने की सलाह देते हैं। मांस और मछली भारी भोजन माने जाते हैं। सावन के महीने में दाल, हरी सब्जियां, फलाहार, दूध और हल्का भोजन करना सर्वोत्तम माना जाता है।
सावन के महीने में मांसाहार क्यों नहीं करना चाहिए इसके पीछे की एक और वजह यह है कि बरसात के दिनों में मौसम में नमी अधिक होती है। इससे बैक्टिरिया और दूसरे वायरस तेजी से बढ़ते हैं। मांस और मछली को मारकर ही पकाया जाता है। ऐसे में बरसात के दिनों में ठीक तरह से सफाई कर न बनाने पर बीमारियों की संभावना बढ़ जाती है।
पांचवां कारण: आत्मसंयम का अभ्यास….इस बात को याद रख लें कि सावन का महीना सिर्फ पूजा पाठ का महीना नहीं है बल्कि अनुशासन और आत्मसंयम का भी महीना है। कुछ समय के लिए अपनी पसंदीदा चीजों और शौक का त्याग करना आत्मसंयम और मानसिक दृ़ढता का अभ्यास माना जाता है। यही वजह है कि सावन के महीने में मांसाहार को त्यागने और सात्विज जीवनशैली अपनाने पर जोर देते हैं।
यह सही है कि हमारी आस्था हमें सावन के महीने में मांस मछली खाने से रोकती है लेकिन इसके पीछे धार्मिक सोच के साथ साथ प्रकृति का संरक्षण, आत्मसंयम, आयुर्वेदिक सलाह, स्वास्थय संबंधी सतर्कता जैसे कई वजह जुड़े हुए हैं। हमारी सनातन परंपरा में इसीलिए किसी भी पवित्र महीने और त्योहारों के दिन मांसाहार को वर्जित किया गया है। आज भी हर सच्चा सनातनी इस परंपरा का श्रद्धा और विश्वास के साथ पालन करती है।
डिस्क्लेमर: यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं, आयुर्वेदिक दृष्टिकोण और पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी की व्यक्तिगत आस्था, खानपान की पसंद या जीवनशैली का समर्थन अथवा विरोध करना नहीं है।
