Janmashtami: भगवान श्रीकृष्ण के भक्तों के लिए जन्माष्टमी सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि कान्हा के जन्म का वह पावन अवसर है, जिसका इंतजार पूरे साल किया जाता है। इस दिन घर–घर में लड्डू गोपाल की पूजा होती है, भक्त व्रत रखते हैं, भजन–कीर्तन करते हैं और आधी रात को भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाते हैं। लेकिन इस बार जन्माष्टमी की तारीख को लेकर लोगों के मन में एक सवाल जरूर है—आखिर व्रत 3 सितंबर को रखा जाएगा या 4 सितंबर को? अगर आपके मन में भी यही असमंजस है, तो आइए जानते हैं पंचांग के अनुसार जन्माष्टमी की सही तारीख और पूजा की पूरी विधि।

पंचांग के अनुसार भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 3 सितंबर की रात 12 बजकर 26 मिनट से शुरू होगी और 4 सितंबर की रात 12 बजकर 14 मिनट तक रहेगी। ऐसे में इस साल जन्माष्टमी का व्रत 4 सितंबर को रखा जाएगा। यानी भक्त 4 सितंबर को पूरे दिन व्रत रखकर रात में भगवान श्रीकृष्ण की जन्म पूजा कर सकते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और आधी रात के समय हुआ था। इसी वजह से जन्माष्टमी की पूजा में तिथि और नक्षत्र दोनों का विशेष महत्व माना जाता है। इस बार रोहिणी नक्षत्र 3 सितंबर की रात करीब 11 बजकर 30 मिनट से शुरू होगा और 4 सितंबर की रात 12 बजकर 14 मिनट तक रहेगा। यही कारण है कि 4 सितंबर को जन्माष्टमी मनाना शुभ माना जा रहा है।
इस बार जन्माष्टमी को एक खास संयोग भी बन रहा है। आधी रात के समय अष्टमी तिथि के साथ रोहिणी नक्षत्र और वृषभ राशि में चंद्रमा का संयोग बनेगा। धार्मिक मान्यताओं में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मकाल से जुड़े इन संयोगों को बेहद शुभ माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि ऐसे समय में श्रद्धा और नियमपूर्वक श्रीकृष्ण की पूजा करने से विशेष आध्यात्मिक फल प्राप्त होता है।
अब बात करते हैं जन्माष्टमी की पूजा की। जन्माष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ कपड़े पहनें। इसके बाद पूजा स्थल की अच्छी तरह सफाई करें। भगवान श्रीकृष्ण या लड्डू गोपाल की प्रतिमा को चौकी या पालने पर स्थापित करें। कान्हा को नए वस्त्र पहनाएं, उनका श्रृंगार करें और पीले फूलों की माला अर्पित करें। धूप और दीप जलाकर भगवान की पूजा करें। इस दौरान ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ और ‘ॐ नमो भगवते श्रीगोविन्दाय’ मंत्र का जाप किया जा सकता है।
जन्माष्टमी की सबसे महत्वपूर्ण पूजा आधी रात को होती है। मान्यता है कि इसी समय भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। आधी रात को कान्हा का दूध, दही, पंचामृत और शुद्ध जल से अभिषेक करें। इसके बाद उन्हें नए वस्त्र पहनाकर श्रृंगार करें और पालने में झूला झुलाएं। भगवान को माखन–मिश्री का भोग लगाना बेहद शुभ माना जाता है। इसके साथ खीर, पंजीरी, फल और नारियल भी अर्पित किए जा सकते हैं। पंचामृत में तुलसी दल जरूर शामिल करें।
व्रत रखने वाले भक्तों के लिए भी यह सवाल महत्वपूर्ण है कि व्रत कब खोला जाए। जन्माष्टमी की आधी रात भगवान के जन्म के बाद पूजा और प्रसाद ग्रहण करने की परंपरा है। हालांकि व्रत खोलने की परंपरा अलग–अलग संप्रदाय और परिवारों में अलग हो सकती है, इसलिए अपने घर की परंपरा और स्थानीय पंचांग का भी ध्यान रखें।
अगर कोई व्यक्ति निर्जला व्रत नहीं रख सकता, तो उसे परेशान होने की जरूरत नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति केवल उपवास तक सीमित नहीं है। श्रद्धा से पूजा करना, भगवान का ध्यान करना, मंत्र जाप करना और भजन–कीर्तन करना भी जन्माष्टमी की भक्ति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
तो इस साल जन्माष्टमी को लेकर आपका असमंजस दूर हो गया होगा। 4 सितंबर 2026 को जन्माष्टमी का व्रत रखा जाएगा और आधी रात में कान्हा के जन्म का उत्सव मनाया जाएगा। भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में डूबकर मनाई जाने वाली यह रात भक्तों के लिए बेहद खास होगी। जय श्रीकृष्ण!
डिस्क्लेमर: इस वीडियो में दी गई जन्माष्टमी की तारीख, तिथि, नक्षत्र, पूजा–विधि और व्रत से जुड़ी जानकारी सामान्य धार्मिक मान्यताओं और उपलब्ध पंचांग गणनाओं पर आधारित है। अलग–अलग स्थानों, पंचांगों और धार्मिक परंपराओं के अनुसार तिथि एवं पूजा के समय में थोड़ा अंतर हो सकता है। व्रत और पूजा से जुड़े किसी भी निर्णय से पहले अपने स्थानीय पंचांग या विद्वान पंडित से सलाह जरूर लें। इस वीडियो का उद्देश्य केवल धार्मिक एवं सामान्य जानकारी प्रदान करना है।
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