No Cost EMI: आज के डिजिटल दौर में ऑनलाइन शॉपिंग और बड़े इलेक्ट्रॉनिक स्टोर्स पर आप अक्सर “नो कॉस्ट ईएमआई” ऑफर देखते होंगे। टीवी और सोशल मीडिया पर इसके विज्ञापन इतने आकर्षक लगते हैं कि ग्राहक सोचते हैं, “वाह! अब हमें ब्याज नहीं देना पड़ेगा और महंगे गैजेट्स भी आसान किस्तों में मिल जाएंगे।” लेकिन क्या सच में यह ऑफर इतना आसान और सच है? या इसके पीछे छिपे हैं कुछ ट्रिक्स जो आपकी जेब पर भारी पड़ सकते हैं? आज हम इसी के बारे में विस्तार से जानेंगे।

नो कॉस्ट EMI का असली मतलब
नो कॉस्ट EMI का मतलब आम भाषा में यह होता है कि ग्राहक को प्रोडक्ट के लिए ब्याज नहीं देना होगा। लेकिन असलियत में ऐसा होता नहीं। बैंक और NBFC सीधे 0% ब्याज वाला ऑफर नहीं देते। कंपनियां अक्सर प्रोडक्ट की कीमत में पहले ही बदलाव करके ब्याज को एडजस्ट कर देती हैं। उदाहरण के लिए, अगर कोई टीवी 50,000 रुपये का है और कंपनी 0% ईएमआई ऑफर देती है, तो असल में कंपनी टीवी की कीमत बढ़ाकर या डिस्काउंट घटाकर ब्याज को अपने मार्जिन में शामिल कर देती है।
इसके अलावा, कुछ मामलों में प्रोसेसिंग फीस, जीएसटी और कार्ड चार्जेज अलग से लगाए जाते हैं। यानी ब्याज सीधे तौर पर नहीं दिखता, लेकिन ग्राहक वसूली के दौरान लगभग उतनी ही रकम ज्यादा चुका देता है।

कैसे काम करता है नो कॉस्ट EMI मॉडल
अधिकतर रिटेलर डिस्काउंट देने की बजाय EMI को आसान दिखाने के लिए प्रोडक्ट की कीमत में बदलाव करते हैं। ग्राहक सोचता है कि उसने 0% ब्याज पर खरीदी की है, लेकिन असल में उसने मिलने वाला डिस्काउंट खो दिया।
इसके अलावा, अगर ग्राहक किसी किस्त को समय पर नहीं चुकाता है, तो भारी पेनाल्टी लगती है। कई स्टोर्स पर “नो कॉस्ट EMI” पर प्रोसेसिंग फीस, GST और क्रेडिट कार्ड चार्ज भी अलग से जोड़ दिए जाते हैं। इसका मतलब, जो कीमत आपको दिख रही है, वह अक्सर असली कीमत से ज्यादा होती है।
क्रेडिट कार्ड और NBFC की भूमिका
यह ऑफर मुख्य रूप से क्रेडिट कार्ड EMI या NBFC लोन के जरिए दिया जाता है। कार्ड कंपनियां और फाइनेंसर 0% ब्याज का दावा तो करते हैं, लेकिन उनकी कमाई रिटेलर से वसूले गए मार्जिन और छिपे हुए चार्जेज से होती है।
असल में ग्राहक यह सोचकर EMI लेता है कि वह ब्याज बचा रहा है, जबकि कई बार वास्तविक भुगतान ब्याज से भी ज्यादा हो जाता है।

ग्राहक इसे कैसे समझें और सावधान रहें
- एमआई और कैश प्राइस की तुलना करें – कोई भी EMI ऑफर लेने से पहले प्रोडक्ट की नकद कीमत और EMI कीमत का कंपेयर जरूर करें।
- छिपे हुए चार्जेज पर ध्यान दें – प्रोसेसिंग फीस, GST और कार्ड चार्जेज को ध्यान से देखें।
- डिस्काउंट चेक करें – कभी–कभी रिटेलर डिस्काउंट को घटाकर ही EMI दिखाते हैं।
- पेनाल्टी की जानकारी लें – EMI समय पर चुकाने में देरी होने पर कितना चार्ज लगेगा, यह जानना जरूरी है।
नो कॉस्ट EMI का ऑफर बहुत आकर्षक लगता है, लेकिन असलियत में इसमें कई बार ग्राहकों को ज्यादा पैसे चुकाने पड़ते हैं। इसलिए खरीदारी से पहले हमेशा पूरी जानकारी लें और समझदारी से फैसला करें कि EMI लेना आपके लिए फायदेमंद है या नहीं।
याद रखें, स्मार्ट शॉपिंग का मतलब केवल आसान किस्तों में खरीदना नहीं, बल्कि पैसे की सही समझ और बचत भी है।
