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क्रिकेट का इकलौता कप्तान, जिन्होंने लगातार 2 विदेशी सीरीज जीती

अपनी कप्तानी में जिसने अजेय वेस्टइंडीज को जीता

पिता बनाना चाहते थे इंजिनियर बेटे ने बढाया देश का मान

मैदान पर गए पानी पिलाने, घरेलु क्रिकेट के बादशाह से बन गए भारत के महान क्रिकेटर

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अगर क्रिकेट को विश्व का सबसे प्रसिद्द और लोकप्रिय खेल कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. इस खेल को दुनियाभर के लोग देखते हैं और खेलते हैं. क्रिकेट का जनक इंग्लैंड है लेकिन जिस देश में इसे सबसे अधिक प्यार मिला वह भारत है. भारत में क्रिकेट सिर्फ एक खेल नहीं बल्कि धर्म की तरह है.

वर्तमान में क्रिकेट इतना लोकप्रिय हो चूका है कि इसके नियम-उपनियम के बारे में छोटे बच्चे भी जानकारी रखते हैं लेकिन इस बात की जानकारी काफी कम लोगों को होगी कि भारतीय क्रिकेट को विश्वस्तरीय गौरव दिलाने वाले भारतीय कप्तान कौन थे. आज हम उन्हीं के बारे में बताने वाले हैं.
दोस्तों, आप देख रहे हैं चक दे क्रिकेट की खास पेशकश चक दे क्लिक्स और आज के अंक में हम बात करेंगे भारतीय टीम के उस कप्तान की, जिसने भारतीय क्रिकेट को विश्वस्तरीय गौरव दिलाया. जिसकी कप्तानी में पहली बार भारत ने वेस्टइंडीज और इंग्लैंड को टेस्ट सीरीज हराया. आज के विडियो में हम भारत का नाम विश्व क्रिकेट में ऊँचा करने वाले अजीत वाडेकर के क्रिकेट करियर और जीवन की कुछ जानी-अनजानी और अनकही बातों को जानने की कोशिश करेंगे.
Ajit Wadekar PHOTOअजीत लक्ष्मण वाडेकर का जन्म 1 अप्रैल, 1941 को बोम्बे(अब मुंबई) के ब्राह्मण परिवार में हुआ था. पिता लक्ष्मण वाडेकर अपने बेटे अजीत को इंजिनियर बनाना चाहते थे और मां एक डॉक्टर लेकिन अजीत ने क्रिकेट में अपना करियर बनाया. दरअसल, बचपन में अजीत वाडेकर की रूचि खेलों से ज्यादा गणित में थी. गणित में सर्वाधिक अंक अर्जित करने में जब उनको इनाम में बल्ला मिला, जिसपर नील हार्वे के हस्ताक्षर थे, अजीत वाडेकर उसे लेकर अभ्यास में लग गए.

एलिफेस्टेन कॉलेज में पढ़ते हुए एक बार टीम में एक खिलाड़ी की कमी होने पर उन्हें चुना गया था. और वाडेकर ने गजब का प्रदर्शन किया था. यहीं से क्रिकेट के प्रति उनकी रूचि बढ़ी. कॉलेज से आते-आते क्रिकेट ग्राउंड पर पहुंचने में उन्हें अक्सर देर हो जाया करती थी, तब ट्रेनर उन्हें मैदान के चारों तरफ दौड़ाकर सजा दिया करते थे.

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इस सजा की वजह से उनको दौड़ने का अच्छा खासा अभ्यास हो जाता था. अजीत एक बेहतरीन स्लिप फिल्डर भी थे और एक अचूक निशानेबाज. उनका निशाना ऐसा था कि एक ही पत्थर से वो कई आमों को एक साथ गिरा दिया करते थे.
बम्बई विश्वविद्यालय से अजीत वाडेकर ने प्रथम श्रेणी से एमएससी की परीक्षा पास की. साल 1959 में अपनी कॉलेज टीम से खेलते हुए एक बार अजीत वाडेकर ने 324 रन बना दिए थे. इसके बाद ही वो बोम्बे रणजी टीम के चयनकर्ताओं के रडार में आ गए थे. अजीत वाडेकर एक बेहतरीन बल्लेबाज के साथ-साथ एक कुशल कप्तान भी थे. उन्होंने 1957 से 1962 तक बम्बई विश्वविद्यालय की टीम का प्रतिनिधित्व किया. 1961-62 में वो विश्वविद्यालय के कप्तान भी रहे. दिल्ली के खिलाफ 324 रनों की पारी खेलने के बाद उनको बोम्बे रणजी टीम में जगह मिली. अजीत वाडेकर अपनी क्रिकेटर बनने की कहानी सुनाते हुए कहते हैं, एक बार वो पूर्व भारतीय क्रिकेटर बालू गुप्ते के साथ बस में एलीफिन्सटोन कॉलेज जा रहे थे, बालू गुप्ते उनके ही कॉलेज में दो साल सीनियर थे. गुप्ते आर्ट्स में थे और वाडेकर साइंस के स्टूडेंट थे. दोनों एक ही बस में जा रहे थे. एक दिन बालू गुप्ते ने उनसे पूछा, “अजीत क्या तुम हमारी कॉलेज क्रिकेट टीम के 12वें खिलाड़ी बनोगे?’ उनकी प्लेइंग 11 बेहतरीन थी, लेकिन उनके पास मैदान पर पानी ले जाने वाला खिलाड़ी नहीं था.” वाडेकर कहते हैं इसके लिए उन्हें एक दिन के लिए 3 रूपए का ऑफर मिला था. 1957 में तीन रूपए की कीमत बहुत होती थी और यहीं से अजीत वाडेकर ने क्रिकेट की दुनिया में कदम रखा था.

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रणजी ट्रॉफी में भी वाडेकर का प्रदर्शन शानदार रहा. उन्होंने फर्स्ट क्लास क्रिकेट में रनों के अंबार लगा दिए. 1966-67 सत्र में मैसूर के खिलाफ वाडेकर ने 323 रनों की पारी खेली, जो उनके फर्स्ट क्लास करियर का सर्वश्रेष्ठ स्कोर साबित हुआ. अजीत ने कुल 18 दलीप ट्रॉफी मुकाबले खेले, जिनमें 6 में वो वेस्ट जोन के कप्तान रहे, वहीं रणजी में उन्होंने बम्बई टीम की 6 बार कप्तानी की.
घरेलु क्रिकेट में लाजवाब प्रदर्शन के कारण उनको टीम इंडिया का टिकट मिला और अंतराष्ट्रीय मंच पर तो उन्होंने कमाल ही कर दिया.
13 दिसंबर, 1966 को वेस्टइंडीज के विरुद्ध मुंबई के ब्रेबोर्न स्टेडियम में अजीत वाडेकर ने अपना टेस्ट अंतराष्ट्रीय डेब्यू मैच खेला था. अपने अंतराष्ट्रीय टेस्ट डेब्यू पर वाडेकर का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा था. पहली पारी में वो 8 रन और दूसरी पारी में सिर्फ 4 रन बनाकर ही आउट हो गए थे. इसके बावजूद वो टीम के नियमित सदस्य बने रहे और 1966 से 1974 तक भारत के लिए कुल 37 टेस्ट मैच खेले जिसमें वो नंबर-3 पर बल्लेबाजी करने उतरते थे. अजीत भारत के लिए खेलते हुए स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया में पार्ट टाइम नौकरी भी करते थे क्योंकि उस वक्त क्रिकेट में ज्यादा पैसा नहीं थे इसलिए क्रिकेट बस शौक से खेली जाती थी. उस वक्त लोग क्रिकेट विलासितापूर्ण जीवन या पेशे के रूप में रहने के बजाय राष्ट्र के गौरव को बनाए रखने के लिए खेलते थे. वाडेकर के अनुसार उस वक्त एक टेस्ट मैच खेलने के लिए खिलाड़ी को 2500 रूपए मिलते थे.

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रणजी में बम्बई का कप्तान बनने के बाद उनको भारतीय टीम की भी कप्तानी मिल गई थी. वो साल था 1971 का, जब सुनील गावस्कर, गुंडप्पा विश्वनाथ, फारुख इंजिनियर और स्पिन चौकड़ी जिसमें बिशन सिंह बेदी, इरापल्ली प्रसन्ना, भागवत चंद्रशेखर और एस वेंकटराघवन टीम इंडिया में शामिल थे और वाडेकर टीम का नेतृत्व कर रहे थे. 70 के दशक में जब वेस्टइंडीज की टीम अजेय थी, वाडेकर के नेतृत्व में भारतीय टीम ने उस शक्तिशाली टीम को ना सिर्फ चुनैती दी, बल्कि 5 टेस्ट मैच हराए, उसके बाद इंग्लैंड को तीन. उन्होंने अपनी कप्तानी में भारत को लगातार 3 सीरीज जितवाए. इंग्लैंड को दोबारा हराकर, 1972-73 में 5 मैचों की सीरीज में 2-1 से.

फिर 1974 में वाडेकर के ही नेतृत्व में भारतीय टीम ने इंग्लैंड का दौरा किया था. उसी दौरे पर अजीत वाडेकर ने किसी वनडे मैच में पहली बार भारतीय टीम की कप्तानी की थी. अपने पहले वनडे मैच में नंबर-3 पर बल्लेबाजी करते हुए उन्होंने 67 रन बनाए थे, हालांकि इंग्लैंड वह मैच जीत गया था. दूसरे वनडे में वो नंबर-4 पर उतरे लेकिन 6 रन ही बना पाए. और यही उनके करियर का आखिरी वनडे रहा. 2 मैच के अपने वनडे करियर में वाडेकर ने 81.11 की स्ट्राइक रेट से 73 रन बनाए. उस दौरे पर भारतीय टीम को टेस्ट सीरीज में भी एकतरफा हार मिली थी इसलिए वाडेकर ने हार की जिम्मेदारी अपने ऊपर जिम्मेदारी लेते हुए इंटरनेशनल क्रिकेट से संन्यास की घोषणा कर दी. उस दौरे के बाद वाडेकर ने सिर्फ 1 फर्स्ट क्लास मुकाबला खेला और क्रिकेट से सभी प्रारूपों से संन्यास का ऐलान कर दिया.

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हालांकि ये क्रिकेट से उनका प्यार ही था कि संन्यास के बाद भी वो खुद को क्रिकेट से अलग नहीं रख पाए. 90 के दशक में भारतीय क्रिकेट टीम के मैनेजर के रूप में वो मोहम्मद अजहरुद्दीन के साथ कार्यरत रहे. बाद में उन्होंने चयनकर्ता के रूप में भी काम किया. अजीत वाडेकर उन चुनिन्दा भारतीय खिलाड़ियों में से हैं, जिन्होंने देश का प्रतिनिधित्व एक टेस्ट प्लेयर, कप्तान, कोच/मैनेजर और चेयरमैन ऑफ सेलेक्टर्स के रूप में किया. वाडेकर के अलावा लाला अमरनाथ और चंद्रू बोर्डे ने यह उपलब्धि हासिल की है.

15 अगस्त 2018 को 78 वर्षीय वाडेकर ने मुंबई के जसलोक अस्पताल में अंतिम सांस ली. 17 अगस्त को पूरे सम्मान के साथ मुंबई के शिवाजी पार्क में उनका अंतिम संस्कार हुआ. कई क्रिकेटर और बड़ी संख्या में फैन्स उनके अंतिम दर्शन को पहुंचे थे.

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खेल के प्रतिभाओं को पहचानने के लिए वाडेकर को भारत सरकार ने अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया था. 1972 में उनको भारत के चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया था. और कई पुरस्कार जैसे CK नायडू लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड, स्पोर्ट्सपर्सन ऑफ द इयर और कैस्ट्रोल लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से भी.

अजीत वाडेकर ने 37 अन्तराष्ट्रीय टेस्ट मैचों में 2113 रन बनाए जिसमें उनके बल्ले से 1 शतक और 14 अर्धशतक आए. 143 उनका उच्चतम स्कोर रहा. 237 फर्स्ट क्लास मैचों में उनके नाम 15,380 रन दर्ज हैं, जिसमें 36 शतकीय और 84 अर्धशतकीय पारियां शामिल रही. फर्स्ट क्लास में उन्होंने गेंदबाजी भी की और 21 विकेट हासिल किए. 323 उनका उच्चतम स्कोर रहा.

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अजीत वाडेकर एक ऐसे कप्तान जिन्होंने विदेशी सरजमीं पर लगातार 2 सीरीज जीती उसके बाद एक घरेलु धरती पर यानी लगातार 3 सीरीज में जीत. वाडेकर को छोड़ क्रिकेट के किसी कप्तान ने लगातार दो विदेशी सीरीज नहीं जीती है. यही कारण है कि उनको ‘लकी क्रिकेटर’ कहकर भी पुकारा जाता है.

अजीत वाडेकर का नाम निःसंदेह भारत के उन महान क्रिकेटरों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है, जिन्होंने अपनी कप्तानी में विदेशी धरती पर भारत को पहली बार जीत दिलाई. वह अनुशानप्रियता और भाईचारे के लिए भी जाने जाते थे. ऐसे महान भारतीय क्रिकेटर को चक दे क्रिकेट की पूरी टीम शत शत नमन करती है और अपनी श्रधांजलि अर्पित करती है. दोस्तों, आज के क्रिकेटरों को अजीत वाडेकर से क्या सीखने की जरुरत है ? कमेंट करके जरुर अपनी राय दें.

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