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बिहार का वो स्थल जहाँ भगवान बुद्ध को मिला था जीवन दान

अगर ये नहीं होती तो नहीं होते गौतम बुद्ध

इस स्त्री की वजह से आज है पूरा बौद्ध समुदाय

आखिर कौन थी भगवान बुद्ध की जान बचाने वाली वो स्त्री महान

बिहारी विहार में आज हम आपको ले चलेंगे राजधानी पटना से 180 KM और बौद्ध गया से तक़रीबन 3 KM पर स्थित एक प्राचीन स्तूप सुजाता गढ़, वह स्थान है जहां भगवान बुद्ध को सुजाता नाम की एक महिला ने खीर खिलाया था. इस प्रकार, सुजाता के नाम पर इस स्थान का नाम सुजाता गढ़ रखा गया.

यहाँ जाकर आप क्या क्या देख सकेंगे क्या अनुभव प्राप्त कर सकेंगे वो सब बताने से पहले मैं आपको सुजाता के बारे में बताना चाहूंगी जिनकी वजह से आज दुनियाभर में 48.8 करोड़ बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं.

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सुजाता को जानने के लिए हम आपको सबसे पहले लेकर चलेंगे बिहार के गया में स्थित सुजाता गढ़ जो की बौद्धकाल में सेनानी ग्राम के नाम से जाना जाता है. पौराणिक कथा के अनुसार सेनानी गाँव में रहने वाली एक सुन्दर सुशील सी उपासिका थी जो अभी तक कुंवारी थी. कहा जाता है की सुजाता को अपने लिए सुयोग्य वर की तलाश ख़त्म करने के लिए उसके गाँव के जानने वाले लोग सुजाता को सलाह देते हैं की सुयोग्य पति प्राप्ति के लिए तुम्हे निरंजना नदी के पास स्थित बरगद के पेड़ को खीर चढाने से तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी. उस समय के लोग वृक्ष आदि की खूब पूजा करते थे. वृक्ष को भगवान मानते थे. ये परम्परा उसी समय से अभी तक चलती आ रही है. आज भी हमलोग बरगद या पीपल जैसे वृक्षों की पूजा करते हैं. उस समय भी लोगो की वृक्षों पर अटल विश्वास होती थी. इसी सिलसिले में सुजाता मन में विश्वास लिए निरंजना नदी के किनारे बरगद के पेड़ के पास पहुँचती है. और वहां पहुंचकर अपनी मन्नते मांगी. फिर कुछ दिनों बाद सुजाता की शादी हो जाती है. सुजाता को अपने जैसा ही एक सुशील और सुयोग्य वर मिल जाता है. यही नहीं कुछ समय के बाद सुजाता को एक सुन्दर पुत्र की प्राप्ति भी होती है. ऐसे में सुजाता की ये दोनों इच्छाएं सम्पूर्ण हो जाती हैं. इस दौरान सुजाता सोचती है की हमारी मन्नते तो पूरी हो गयी क्यों न हम बरगद देवता को भोग लगा आए. कहा जाता है की सुजाता तकरीबन 1000 गायों को पालती थी. वो वाल्मी घास खिलाकर वो इन गायों को पालती थी. कहा जाता है कि सुजाता 1000 गायों से दूध निकालकर 500 गायों को खिलाती थी. फिर 500 गायों से दूध निकालकर 250 गायों को खिलाती थी. और आखिर कार 8 गाय बच जाता है. इन 8 गायों का दूध निकालकर सुजाता ने उस दूध से बड़ा ही स्वादिष्ट खीर बनाया. इसके बाद सुजाता उस बरगद के पेड़ के पास जाती हैं. वहां पहुंचकर सुजाता देखती है की एक भिच्छु पड़ा हैं. बस कुछ लम्हे में जान जाने वाली है. सुजाता यहाँ बिना समय गवाए भगवान बुद्ध को खीर खिलाती हैं. इसके बाद भगवान बुद्ध ने अपने होठ हिलाएं. फिर धीरे धीरे भगवान बुद्ध के शरीर में जान आयी. और शारीर में हलचल हुई. मृत्यु के शरण में पहुँच चुके भगवन बुद्ध ने पहली भिक्षा सुजाता की हाथों उस खीर को खाकर ही ली थी. फिर कुछ समय बाद बुद्ध बोलने की स्थिति में आए. तो ऐसे सुजाता ने भगवान बुद्ध की जान बचाई.

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इसके बाद भगवान बुद्ध ने सुजाता अको अपनी जीवनी बताई. भगवान बुद्ध ने कहा मैंने जीवन की तपस्या का कड़ा और कठिन मार्ग देने वाला तीक्ष्ण व्रतों का प्रयोग किया. और मैं निरंजना नदी पार भी नहीं कर पाया और गिर पाया. और आपने मुझे बचाया. अब मैं ये कठिन तपस्या का मार्ग छोड़ रहा हूँ. क्यूंकि मैं मर जाता तो मेरा लक्ष्य अधूरा रह जाता. सुजाता ने उन्हें अपने गाँव में रुकने को कहा लेकिन महात्मा बुद्ध ने मना कर दिया और कहा मैं अब निरंजना पार सकता हूँ आपके खीर के सेवन से मुझमें इतनी शक्ति आ गई है. भगवान बुद्ध ने निरंजना नदी पार किया जहाँ एक विशाल पीपल का पेड़ था. जिसे देख भगवान बुद्ध ने कहा अब यही हमारा स्थान होगा. और वहीँ उन्होंने ज्ञान की प्राप्ति की. ऐसे में कहा जाता है की सुजाता ना सिर्फ भगवान बुद्ध की जान बचाई बल्कि भगवान बुद्ध की ज्ञान प्राप्ति के लिए मार्ग प्रशस्त की. भगवान् बुद्ध के जीवन में सुजाता का अहम योआन रहा या फिर यूँ कहे की सुजाता थी जिनकी वजह से आज भगवन बुद्ध हमारे बीच हैं.

बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति होने के बाद जिस जगह पर सुजाता ने उन्हें खीर खिलाई थी उसी जगह पर एक स्तूप बनवाया गया इसे ही सुजातागढ़ कहा गया. यह स्तूप किसी टीले की भांति लागता है जो छोटेछोटे ईटों को जोड़कर बनवाया गया है. उसका आकार भी बड़ा ही लुभावना है, जो पूर्ण रूप से गोलाकार नहीं है. अगर आप ध्यान से देखेंगे तो आपको इस स्तूप पर गिरते हुए चूने के निशान नज़र आएंगे, जो उसकी सुंदरता को भंग करता है. यह स्तूप गुप्त काल से लेकर पाल काल तक निर्माण की अनेकों अवस्थाओं से गुजर चुका है. उत्खनन की इस जगह पर पायी गयी बहुत सी प्राचीन वस्तुएं आज भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संग्रहालय में प्रदर्शन के लिए रखी गयी हैं.

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सुजाता स्तूप, सुजाता कुटी स्तूप या सुजाता गढ़ बिहार राज्य में बोधगया के पूर्व में सेनानीग्राम जो अभी बकरौर गाँव में स्थित एक स्तूप है. यह शुरू में दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में बनाया गया था जैसा कि पास के मठ में एक पंचचिह्नित सिक्का की खोज से पुष्टि की गई है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने 1973-74 और 2001-06 में उत्खनन में मिली एक पट्टिका में 8 वीं -9 वीं शताब्दी का एक शिलालेख है जिसमें देवपाल राजस्य सुजाता गृहलिखा हुआ है. देवपाल की व्याख्या 9 वीं शताब्दी के पाल राजवंश राजा के रूप में की जाती है, इसका अर्थ है राजा देवपाल का सुजाता घर. इससे पता चलता है कि सुजाता के समरण के लिए स्तूप का अंतिम चरण का निर्माण 9 वीं शताब्दी में देवपाल ने किया था,

अगर आप भी इतिहासों से रूबरू होना चाहते हैं उन्हें पास से जानना चाहते हैं तो गया पहुँचने पर सुजाता गढ़ अवश्य जाएं.

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