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पोलियो के कारण हुआ था हाथ खराब, उससे ही तोड़े बल्लेबाजों के ख्वाब

6 साल की उम्र में पोलियो ने किया हाथ खराब, किसे पता था आने वाले समय में वही हाथ बन जाएगा बल्लेबाजों का काल

केवल दो टेस्ट क्रिकेटरों में से एक, जिन्होंने कुल रन से अधिक विकेट लिए हैं

अपने डेब्यू टेस्ट पर जिसने झटके थे 4 विकेट, पहला गेंदबाज जिसने टेस्ट मैच की दोनों पारियों में झटके 6-6 विकेट

अपनी गेंदबाजी से जिसने इंग्लिश बल्लेबाजों को किया धराशाई, भारत ने पहली बार इंग्लैंड में जीती टेस्ट सीरीज

जो बने विस्डन क्रिकेटर ऑफ द इयर, भारत ने दिया पद्मश्री

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दोस्तों, अगर आपका इरादा पक्का हो और दिल में कुछ कर गुजरने का जुनून हो, तो दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं है. और अगर कोई अपनी कमजोरी को ही ताकत बना ले ? आज के लेख में बात होगी भारत के एक ऐसे गेंदबाज की, जो अकेले अपने दम पर मैच का रुख पलट देता था. इनकी गेंदबाजी विदेशी बल्लेबाजों के लिए हमेशा एक रहस्य ही बना रहा. इंग्लैंड में भारत की पहली टेस्ट जीत की कहानी इसी गेंदबाज ने लिखी थी, जब उन्होंने 38 रन देकर 6 इंग्लिश बल्लेबाजों का शिकार किया था. विस्डन ने 2002 में उस गेंदबाजी को शदी का सर्वश्रेष्ठ भारतीय गेंदबाजी प्रदर्शन बताया था. 1972 में गेंदबाज को ‘विस्डन क्रिकेटर ऑफ द इयर’ चुना गया था.

60 के दशक में भारत के पास एक मशहूर स्पिन चौकड़ी हुआ करती थी, आज बात होगी उसी चौकड़ी के स्पिनर भागवत चंद्रशेखर की. आज हम भारत के पूर्व लेग-स्पिनर भागवत चंद्रशेखर के जीवन और क्रिकेट करियर की कुछ जानी-अनजानी और अनकही बातों को जानने की कोशिश करेंगे.

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 भारत ने विश्व क्रिकेट को आला दर्जे के स्पिनर दिए हैं. एक समय था जब भारतीय टीम की गेंदबाजी आक्रमण स्पिन गेंदबाजों के इर्द-गिर्द ही रहती है. उस वक्त टीम में स्पिनरों की फ़ौज हुआ करती थी, आज भी भारत के पास क्वालिटी स्पिन गेंदबाज हैं. लेकिन आज हम बात करेंगे भारत के एक ऐसे स्पिनर की, जो उस मशहूर स्पिन चौकड़ी का हिस्सा था, जिसने भारत में स्पिन गेंदबाजी की नींव रखी, जिसने दुनियाभर के बल्लेबाजों का जीना मुहाल कर दिया था. भारत की उस मशहूर स्पिन-चौकड़ी का एक चौथाई हिस्सा थे – भगवत सुब्रमन्या चंद्रशेखर यानी बीएस चंद्रशेखर यानी चंद्रा. 60 और 70 के दशक में भारतीय गेंदबाजी उस स्पिन चौकड़ी के इर्द-गिर्द घुमती थी और इसके सबसे अनोखे सितारे थे चंद्रा.

भगवत चंद्रशेखर का जन्म 17 मई 1945 को ब्रिटिश शासनकाल के मैसूर साम्राज्य में हुआ था और यहीं उनकी शुरुआती परवरिश और पढ़ाई-लिखाई हुई. फिर कुछ साल बाद परिवार बैंगलोर(अब बेंगलुरु) शिफ्ट हो गया. चंद्रा को क्रिकेट में दिलचस्प हुई ऑस्ट्रेलिया के लेग स्पिनर रिची बेनौड को गेंदबाजी करते हुए देखकर. लेकिन बैंगलोर आने से पहले ही, जब चंद्रा महज 6 साल के थे, पोलियो ने उनके दाहिने हाथ पर अटैक कर दिया, जिससे उनका दाहिना हाथ खराब होने लगा था. किसे पता था कि आगे चलकर वही हाथ बल्लेबाजों का काल बन जाएगा

इसे चंद्रा और भारतीय क्रिकेट की अच्छी किस्मत ही कहेंगे कि करीब 10 साल के होते-होते चंद्रा का हाथ ठीक होने लगा. चंद्रा ने इसके बाद बैंगलोर में क्रिकेट खेलना भी शुरू कर दिया. कहते हैं कि चंद्रा हर तरह ही गेंदबाजी करते थे – ऑफ ब्रेक, लेग ब्रेक यहां तक कि तेज गेंदबाजी भी. लेकिन जब वो 18 साल के हुए तो उन्होंने लेग ब्रेक को अपना ब्रह्मास्त्र बना लिया. पहले मैसूर फिर कर्नाटक के लिए खेलते हुए चंद्रशेखर ने गजब की गेंदबाजी की, और यही उनको भारतीय क्रिकेट तक ले आया.

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1964 में 18 साल के बीएस चंद्रशेखर ने बोम्बे(अब मुंबई) में इंग्लैंड के खिलाफ अपना टेस्ट इंटरनेशनल डेब्यू किया था और 4 विकेट चटकाकर अपनी छाप छोड़ी थी. लेकिन अभी तो असली करिश्मा होना बाकी था. कुछ ही वक्त बीतने के बाद भारतीय कप्तान मंसूर अली खान पटौदी यानी टाइगर पटौदी ने क्रिकेट जगत को स्पिन चौकड़ी से चौंका दिया. इस चौकड़ी में थे इरापल्ली प्रसन्ना, बीएस चंद्रशेखर, बिशन सिंह बेदी और एस वेंकटराघवन. हालांकि ऐसे मौके कम ही आए, जब चारो एक साथ किसी मैच में खेले, मगर हर सीरीज में इन चारों का टीम इंडिया का हिस्सा बनना तय था.

चंद्रशेखर अपनी लेग ब्रेक में गति के अच्छे इस्तमाल के लिए जाने जाते थे और यही कारण था कि बल्लेबाज उनकी गेंद को समझ ही नहीं पाते थे. वो जबतक कुछ समझ पाते चंद्रा उनकी गिल्लियां उड़ा चुके रहते थे. विरोधी बल्लेबाजों के लिए चंद्रा की गेंदबाजी किसी रहस्य से कम नहीं थी, खासकर विदेशी बल्लेबाजों के लिए.

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भारतीय टीम को इंग्लैंड में पहला टेस्ट सीरीज जीताने में चंद्रशेखर ने अहम योगदान दिया था. लंदन के द ओवल में सीरीज का आखिरी मैच खेला गया था, इससे पहले दोनों टेस्ट ड्रा हुए थे इसलिए ओवल टेस्ट निर्णायक टेस्ट मैच था. पहली पारी के आधार पर इंग्लैंड की टीम को भारत पर 71 रनों की बढ़त थी लेकिन दूसरी पारी में वो इसका फायदा नहीं उठा सके, वजह थी चंद्रा की फिरकी का जादू. ओवल की पिच पर चंद्रशेखर ने दूसरी पारी में 38 रन देकर 6 विकेट झटक लिए और इंग्लैंड की टीम सिर्फ 101 रनों पर सिमट गई. भारत को सिर्फ 173 रनों का लक्ष्य मिला और टीम ने 6 विकेट खोकर लक्ष्य को हासिल कर लिया और ना सिर्फ मैच जीता बल्कि सीरीज भी अपने नाम कर ली. यह पहला मौका था जब इंग्लैंड में भारत ने कोई टेस्ट सीरीज जीती थी. भगवत चंद्रशेखर ने मैच में कुल 8 विकेट झटके थे. इसके बाद चंद्रा का नाम भारत में बच्चे-बच्चे के जुबान पर था. ओवल में चंद्रा की उस गेंदबाजी को विस्डन ने शदी का सर्वश्रेष्ठ भारतीय प्रदर्शन बताया था. 1972 के लिए उनको विस्डन क्रिकेटर ऑफ द इयर चुना गया था.

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1976 में न्यूजीलैंड के खिलाफ एक टेस्ट मैच में चंद्रशेखर और प्रसन्ना ने मिलकर 19 विकेट झटके थे और भारत को जीत दिलाई थी. उनके लिए एक प्रसिद्ध अंपायर-निर्देशित उद्धरण है, जो न्यूज़ीलैंड में खराब फैसलों के एक दिन के दौरान किया गया था, जब उनकी कई एलबीडब्ल्यू अपील नॉट आउट दी गई थी: “मुझे पता है कि वह बोल्ड हो गया है, लेकिन क्या वह आउट है?”

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भगवत चंद्रशेखर ने 1977-78 में ऑस्ट्रेलिया दौरे पर भी भारत की जीत में अहम भूमिका निभाई थी. उस श्रृंखला के दौरान वह एक टेस्ट की प्रत्येक पारी में समान आंकड़े दर्ज करने वाले पहले गेंदबाज बने थे. (52 रन देकर 6 विकेट). चंद्रशेखर में बल्लेबाजी का कौशल ना के बराबर था. 1977-78 ऑस्ट्रेलियाई दौरे पर 4 बार शून्य पर आउट होने पर चंद्रा को एक स्पेशल ग्रे-निकोल्स बैट दिया गया था, अपने पूरे टेस्ट करियर में चंद्रा 23 बार शून्य पर आउट हुए. चंद्रा के नाम क्रिकेट इतिहास का एक अनूठा रिकॉर्ड भी दर्ज है. वह दुनिया के ऐसे सिर्फ 2 गेंदबाजों में से एक हैं, जिन्होंने अपने पूरे टेस्ट करियर में जितने रन बनाए हैं, उससे ज्यादा विकेट लिए हैं. चंद्रा के अलावा न्यूजीलैंड के तेज गेंदबाज क्रिस मार्टिन इस अजीबोगरीब रिकॉर्ड के मालिक हैं. बीएस चंद्रशेखर ने भारत के लिए 1979 तक खेला, अपने 15 साल के करियर में उन्होंने 58 टेस्ट मैचों में 242 विकेट झटके जबकि उनके बल्ले से सिर्फ 167 रन निकले. चंद्रा ने अपने पूरे करियर में 16 बार फाइव विकेट हॉल और 12 बार 4-विकेट हॉल पूरा किया था. चंद्रा ने भारत के लिए एक वनडे मुकाबला भी खेला है, जिसमें उन्होंने 3 विकेट हासिल किए थे. चंद्रा के नाम 246 फर्स्ट क्लास मैचों में 1063 विकेट दर्ज हैं.

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टेनिस बॉल से क्रिकेट खेलने की शुरुआत करने वाले, पोलियो से ग्रसित होने के बाद भी अपनी इच्छा शक्ति और प्रतिभा के दम पर बीएस चंद्रशेखर भारत के प्रमुख ‘स्ट्राइक’ गेंदबाज बन गए. कभी कभी वो गेंदबाजी की शुरुआत भी किया करते थे. नई गेंद से वो मध्यम गति के तेज गेंदबाज बन जाते थे. जिस वर्ष भारत की जूनियर क्रिकेट टीम में वो चुने गए उसी साल सीनियर टीम में भी उन्होंने एंट्री मार ली. ऐसा भला कितने क्रिकेटर कर पाते हैं.

चंद्रशेखर चयनकर्ता भी रहे. 1978 में खेल को अलविदा कहने वाले चंद्रा 1990 में एक बार फिर क्रिकेट में वापसी करते हैं लेकिन 1991 में अभ्यास के बाद घर लौटते वक्त ट्रक की टक्कर से उनके बाएं पैर ने काम करना बंद कर दिया. अमेरिका में कई ऑपरेशन हुए लेकिन अब जिंदगी भारी जूते पहनकर कुर्सी पर बीत रहे थे.

चंद्रशेखर मुकेश के ग़मगीन गीतों के बेहद शौक़ीन थे और वो बेगम अख्तर की गजलों को भी सुना करते थे. कर्नाटक की तरफ से रणजी खेलने वाले मनमौजी और शायराना तबीयत के चंद्रा को हिंदी नहीं आती थी लेकिन फिर भी गानों के शौक़ीन थे. इस शौक में विश्वनाथ उनका बराबरी से साथ देते. कहते हैं कि इन्हीं गम भरे गीतों को सुनकर उनमें दोगुना जोश भर आता और बढ़कर गेंदबाजी करते, ऐसा किस्सा आज भी क्रिकेट के पुराने जानकार बताते हैं.

इंग्लैंड में भारत को पहली बार टेस्ट सीरीज जीताने वाले भगवत चंद्रशेखर को चक दे क्रिकेट की पूरी टीम सलाम करती है और उनके उज्जवल भविष्य और स्वस्थ जीवन की कामना करती है. आपको भगवत चंद्रशेखर की कहानी कैसी लगी, कमेंट में हमें जरुर बताएं.

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