कहते हैं किसी भी व्यक्ति को अपने मुकाम तक पहुंचने के लिए उसे लगातार मेहनत करने की जरूरत है. लेकिन आप इस खिलाड़ी का मेहनत देखकर कहेंगे इसकी किस्मत ही खराब है. नहीं तो कोई इतना खेलने के बाद तो महान बन जाता है. चल दे क्लिक्स के आज के सेगमेंट में बात एक ऐसे खिलाड़ी के बारे जिसे कभी दूसरा सचिन तेंदुलकर कहा जाता है. लेकिन इस खिलाड़ी को भारतीय टीम में कभी खेलने का मौका नहीं मिला. लेकिन फर्स्ट क्लास क्रिकेट में इनका जलवा रहा है. लेकिन इस खिलाड़ी के जीवन में सिर्फ इंतजार ही रहा. इस खिलाड़ी ने भारतीय टीम में खेलने को लेकर एक लंबा इंतजार किया लेकिन भारतीय टीम की तरफ से आखिरी तक बुलावा नहीं आया. आप भी समझ ही गए होंगे हम बात कर रहे हैं अमोल मजूमदार के बारे में…

आमोल मजूमदार का जन्म उस समय हुआ था जब भारत हॉकी के बाद क्रिकेट की तरफ अपना रुख कर रहा था. भारत के युवा क्रिकेट में अपनी दिलचस्पी दिखा रहे थे. उस समय महानगरों में क्रिकेट का एक अलग ही क्रेज था. आमोल मजूमदार का जन्म 11 नवंबर 1974 को हुआ था. इनका पूरा नाम अमोल अनिल मजमदार था. इन्हें बचपन से ही क्रिकेट खेलने का शौक था. मजमदार ने शारदाश्रम विद्यामंदिर में पढ़ाई की, जहां वह भविष्य के क्रिकेट स्टार सचिन तेदुलकर के साथी रहे हैं. आपको बता दें कि सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट की शिक्षा देने वाले रमाकांत आचरेकर ने ही विनोद कांबली और आमोल मजूमदार को भी क्रिकेट की शिक्षा दी थी. भारत में जब स्कूली क्रिकेट में सबसे बड़ी पारियों का जिक्र होता है तो उसमें हैरिस शील्ड मैच में विनोद कांबली और सचिन तेंदुलकर द्वारा 664 रन का जरूर जिक्र किया जाता है. आपको जानकर हैरानी होगी इसी टीम के साथ आमोल मजूमदार भी थे जोकि पैड पहनकर अपनी बल्लेबाजी का इंतजार करते रहे लेकिन उन्हें बल्लेबाजी करने का मौका नहीं लिया. और किस्मत देखिए की यह बल्लेबाज आखिरी समय तक भारतीय टीम का हिस्सा नहीं बन पाए.

जिस समय सचिन और काबंली ने बेजोड़ रिकॉर्ड बनाया उस समय सचिन की उम्र मात्र 13 साल की थी. वे पैड पहनकर अपनी बैटिंग का इंतजार ही करते रहे. इतना ही नहीं उन्होंने पैड पहनकर नेट पर प्रैक्टिस भी किया लेकिन इधर विकेट नहीं गिरा और बाद में आमोल की टीम ने 748 रन पर अपनी पारी घोषित कर दी. ऐसे में उन्हें बिना बैटिंग किए ही पैड उतारना पड़ा. और उनके क्रिकेट कैरियर के आखिरी दिनों तक उन्हें भारत के नेशनल टीम के लिए नहीं चुना गया. साल 1993-94 के रणजी ट्रॉफी सीजन में फर्स्ट क्लास डेब्यू किया था. हरियाणा के खिलाफ खेले गए इस मुकाबले मे आमोल ने 260 रन की शानदार पारी खेली थी. इतना ही नहीं उनके नाम एक रिकॉर्ड यह दर्ज हो गया जिसमें फर्स्ट क्लास डेब्यू में सर्वोच्च स्कोर का वर्ल्ड रिकॉर्ड इनके नाम दर्ज हो गया. जोकि उनके नाम दर्ज हैं. इतना ही नहीं उन्होंने इसके बाद भी बल्लेबाजी में वह धार जारी रखा. जिसके बाद उन्हें भारतीय टीम का सचिन तेंदुलकर कहा जाने लगा था. फिर उन्हें भारतीय टीम के अंडर 19 टीम का उपकप्तान भी बनाया गया था.

जिस समय आमोल रणजी में अपना बेहतरीन प्रदर्शन कर रहे थे उस समय घरेलू क्रिकेट में राहुल द्रविड़ भी अपनी टीम के लिए रन बना रहे थे. ऐसे में दोनों खिलाड़ियों को साल 1995 में इंग्लैंड ए के खिलाफ खेलने का मौका मिला. इस सीरीज में तीन टेस्ट मैच और तीन वनडे मैच खेले गए जोकि अनाधिकृत था. टेस्ट मैच में तो भारत–ए को हार का सामना करना पड़ा. इस टेस्ट मैच में मजूमदार का बल्ला नहीं चला लेकिन यहां द्रविड़ खेलने में कामयाव रहें उनके बल्ले से रन निकला. इसके बाद वन–डे मैच में इंडिया–ए टीम को 2-1 से हार का सामना करना पड़ा. लेकिन आमोल ने वन–डे में रन बनाया उन्होंने एक मैच में 79 रन तो वहीं दूसरे मैच में 69 रन बनाया. आपको बता दें कि इस सीरीज में सौरभ गांगुली भी इंडिया–ए टीम का हिस्सा थे. और सौरभ गांगुली दोनों ही सीरीज में नहीं चले.
साल 1996 में भारतीय का दौरा इंग्लैड के लिए होना था जिसमें भारतीय टीम में युवाओं की जरूरत थी. ऐसे में यह उम्मीद किया जा रहा था कि घरेलू मैच में जिसका प्रदर्शन बेहतरीन है ऐसे में उन खिलाड़ियों को मौका मिल सकता है. इन दिनों खिलाड़ियों के चयन को लेकर दलीप ट्रॉफी के द्वारा चयन की बात कही गई थी. जिसमें राहुल द्रविड, सौरभ गांगुली, और वीवीएस लक्ष्मण भी इसमें खेल रहे थे. इसी टुर्नामेंट में लक्ष्मण भी खेल रहे थे. अगर मैच के दौरान की स्थिति को देखे तो इस टुर्नामेंट में सबसे ज्यादा रन लक्षमण ने 395 रन बनाया तो वहीं दविड़ ने 353 रन बनाया तो वहीं मजूमदार ने 333 रन बनाए साथ ही मजूमदार ने नॉर्थ जोन के खिलाफ एक दोहरा शतक भी लगाया. इस सीरीज में सौरभ गांगुली ने 308 रन बनाया था.
जब इंग्लैंड दौरे के लिए खिलाड़ियों के नामों की घोषणा हुई तो उसमें दो नाम थे. राहुल द्रविड़ और सौरभ गांगुली. इन दोनों नामों के पिछे जो तर्क दिया गया उसमें यह बताया गया कि राहुल द्रविड़ उस समय हर जगह बेहतर खेल रहे हैं ऐसे में उन्हें इंग्लैंड जाने का मौका मिला. वहीं सौरभ गांगुली को लेकर जो बात कही गई उसमें यह बताया गया कि सौरभ बाएं हाथ के बल्लेबाज है और वेस्ट जोन की घातक गेंदबाजी के सामने सौरभ ने 171 रन की पारी खेली. जिसके कारण यह कहा जा रहा है कि उनका पलड़ा भारी हुआ. कहा जाता है कि मजूमदार के क्रिकेट कैरियर का यह सबसे बेहतरीन पल था ऐसे में यह उम्मीद जताई जा रही थी कि वे अब भारतीय टीम का हिस्सा हो सकते हैं लेकिन उन्हें यहां भी मौका नहीं मिला.
अब स्थिति यह हो गई थी कि भारतीय टीम का बैटिंग ऑडर पूरी तरह से फूल हो चुका था. सौरभ गांगूली और राहुल द्रविड के बाद आमोल के लिए जगह ही नहीं बचा की वे भारतीय टीम में किस नंबर पर खेलेंगे. वे अपने नेचुरल गेम में नंबर तीन या फिर चार पर बल्लेबाजी करते थे. लेकिन इस
जगह पर राहुल द्रविड़ और सचिन तेंदुलकर पहले से ही काबिज थे. टीम इंडिया में शामिल हुए द्रविड और गांगुली ने एक मौका तक नहीं छोड़ा जिसके चलते कि किसी दूसरे खिलाड़ी को मौका मिले. ऐसे में आमोल की दावेदारी यहां से लगातार कमजोर होती चली गई. ऐसे में एक मौका और बच रहा था आमोल के पास नंबर पांच पर बल्लेबाजी करने मौका मिल सकता था लेकिन लक्ष्मण ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ साल 2001 में 281 रन की शानदारी पारी खेली. जिसके बाद लक्ष्मण का भी भारतीय टीम में एक स्थान पक्का होगा. इसी ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ द्रविड और लक्ष्मण ने कई जीताऊं पारी खेली थी. जिसके बाद इन दिनों खिलाड़ियों को टेस्ट मैच का रिढ़ कहा जाता था.
भारतीय टीम में चयन न होना आमोल को लगातार निराश कर रहा था. इसी दौरान अगस्त 2009 में जब उन्हें बूची बाबू टूर्नामेंट के लिए मुंबई टीम में नहीं चुना गया, तो उन्होंने घोषणा की कि वो अगले रणजी सीजन में असम की ओर से खेलेंगे. अपनी टीम को एलिट डिवीजन में लेकर गए. हालांकि बाद में आमोल ने मुंबई की तरफ से खेलने की इच्छा जाहिर की लेकिन उन्हें एक साल का इंतजार करना पड़ा. लंबे इंतजार के कारण उन्होंने आंध्र प्रदेश का रूख कर लिया. और साल 2012-13 के सीजन में उन्होंने आंध्र के लिए खेलते हुए लगभग 80 की ओसत से उन्होंने 1000 रन भी बनाए.
अमोल के अगर हम घरेलु प्रदर्शन को देखें तो उन्होंने 171 फर्स्ट क्लास मैच में 30 शतक और 60 अर्धशतकों के सहारे 11 हजार से ज्यादा रन बनाए. साल 2014 को उन्होंने क्रिकेट से सन्यास की घोषणा कर दी. आमोल ने अपनी जिंदगी के 21 साल क्रिकेट को दिए और इस दौरान उनके नाम कई उपलब्धियां जुड़ी लेकिन उनका क्रिकेट कैरियर सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, मोहम्द अजहरूद्दीन, सौरभ गांगूली और वीवीएस लक्ष्मण के आगे एक मौका तक नहीं मिल पाया.
साल 2020 में अश्विन से बात करते हुए उन्होंने भारतीय टीम में शामिल नहीं होने पर अपनी बात रखी जिसमें उन्होंने कहा था कि रणजी ट्रॉफी में पहले कुछ सालो में 82 के रन औसत से रन बनाए थे. ऐसे में भी उन्हें नहीं चुना गया था. जिसके कारण काफी निराशा हुई थी. इस दौरान एक समय तो उन्होंने क्रिकेट छोड़ने का मन बना लिया था. एक बारी तो उन्होंने एक महीने तक बैट को हाथ भी नहीं लगाया था. इस दौरान उन्होंने कई मैच खेलने से मना कर दिया था. लेकिन पिता के समझाने के बाद उन्होंने एक बार फिर से खेलना शुरू किया.
इतनी घातक बल्लेबाजी के बाद भी भले ही आमोल को भारतीय टीम में जगह नहीं मिली हो लेकिन मजूमदार ने भारत की अंडर-19 क्रिकेट टीम को और भारत की अंडर-23 टीम के बल्लेबाजी कोच के रूप में उन्होंने योगदान दिया है. दिसंबर 2013 में उन्हें नीदरलैंड क्रिकेट टीम के लिए बल्लेबाजी सलाहकार केरूप में नियुक्त किया गया था. साल 2018 में आमोल मजूमदार को राजस्थान रॉयल्स का बल्लेबाजी कोच के रूप में नियुक्त किया गया था. भारतीय टीम की तरफ से एक भी अंतरराष्ट्रीय मैच नहीं खेलने वाले धाकड़ बल्लेबाज को दक्षिण अफ्रिका क्रिकेट टीम के बल्लेबाजी कोच के रूप में नियुक्त किया गया था. इसके बाद उन्होंने मुंबई टीम का कोच भी नियुक्त किया गया है.
दक्षिण अफ्रिका के कोच बनने के बाद जब उनसे यह पुछा गया कि क्या बिना अंतरराष्ट्रीय मैच खेले कैसे उच्च कोचिंग दे सकते हैं. इसके जवाब में उन्होंने कहा कि ये एक धारणा है जिसे भारतीय लोग लेकर चल रहे हैं. और मैं इसे तोड़ना चाहूंगा. अगर आप अपने विषय को अच्छे से जानते हैं तो मुझे नहीं लगता है कि अंतरर्रास्ष्ट्रीय स्तरपर खेलने का अनुभव मायने रखता है. मैं सभी स्तरों की बल्लेबाजी से कार्य कर रहा हूं जो कि मेरे लिए एक विषय है. और अगर आप अपने विषय को अच्छी तरह से जानते हैं तो अनुभव और अन्य सभी चीजें मायने नहीं रखती है.
