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बिहारी बेजोड़ के आज के सेगमेंट में बात एक एक ऐसे बिहारी की जिसने अपने पढ़ाई के दिनों से ही सामाजिक बहिष्कार को झेलना पड़ा. चब वह बचपन में स्कूल जाता था तो दूसरे मटके से पानी पीना पड़ता था उसके विरोध में इसने मटका ही फोड़ दिया. इतना ही नहीं जब जब कॉलेज पहुंचा तो नाई ने बाल तक काटने से मना कर दिया था. तब उन्होंने भेदभाव के खिलाफ एक मुहीम चला दी थी. यह नौजवान जब और जवान हुआ तो पीएम जवाहर लाल नेहरू की पहली कैबिनेट का में मंत्री बना. 1971 के पाकिस्तान विभाजन के समय वह रक्षा मंत्री थे उन्होंने पाकिस्तानियों को छठी का दूध याद दिला था. जब वे कृषि मंत्री बने तो उन्होंने आजाद भारत की पहली हरित क्रांति को सफल बनाया. आप भी समझ ही गए होंगे हम बात कर रहे हैं बाबू जगजीवन राम के बारे में

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बाबू जगजीवन राम का जन्म सन 1906 में बिहार केआरा जिले में हुए था. उन्हें बचपन में भी छूआछुत जैसी कुरितियों का शिकार होना पड़ा था. वे जिस स्कूल में पढ़ते थे वहां पानी पीने के लिए दो अलग अलग मटके थे उन्होंने इसका विरोध किया था. जिसमें उन्होंने मटका फोड़ दिया. स्कूल से निकलने के बाद जब वे कॉलेज में पढ़ाई करने के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय पहुंचे तो वहां भी उन्हें कुरितियों का सामान करना पड़ा. यहां एक नाई ने उनका बाल काटने से मना कर दिया. यहां भी उन्होंने मुखर होकर अपनी बात उठाई. और आखिर में बीएचयू छोड़कर वे कलकत्ता विश्वविद्यालय चले गए. जहां उनकी मुलाकात सुभाष चंद्र बोस से हुई. यहीं पर पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात महात्मा गांधी से हुई. और वे 1931 में कांग्रेस के साथ हो लिए. और वे कांग्रेस के विचारों को आगे बढ़ाने लगे. देश को आजादी मिलने से पहले साल 1946 में अंतरिम सरकार बनी जिसमें सबसे कम उम्र के बने मंत्री. फिर आजाद भारत में जब पहली बार साल 1952 में जब पहला आम चुनाव हुआ तो बाबू जगजीवन राम सासाराम से चुनाव लड़े और जीते उसके बाद साल 1986 तक वे लगातार चुनाव जीतते रहे.और वे 30 साल तक वे कैबिनेट मंत्री रहे हैं.

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देश की राजनीति में जब इंदिरा गांधी का जिक्र होगा तो आपातकाल का जिक्र होगा ही. ऐसे में साल 1975 में इलाहाबाद की एक बेंच ने इंदिरा गांधी के निर्वाचन को अयोग्य घोषित कर दिया. कहा जा रहा था कि इंदिरा पर 6 साल चुनाव लड़ने पर रोक लग जाएगा. ऐसे में जगजीवन राम को यह लग रहा था कि उन्हें कांग्रेस की चाभी मिल सकती है. इंदिरा गांधी ने उन्हें पहला राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया था. जिससे दलितों में एक संदेश गया कि इंदिरा दलितों के हिमायती है. लेकिन ऐसा हुआ नहीं और देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गई लेकिन वे कैबिनेट में बने रहे. हालांकि इमरजेंसी खत्म होने के बाद एक बार फिर से चुनाव हुआ. इस चुनाव से पहले फरवरी 1977 में जगजीवन राम ने अचानक से कांग्रेस छोड़ने का फैसला कर दिया. और अपनी पार्टी कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी नाम दिया. हालांकि बाद में उन्होंने जनता पार्टी से चुनाव लड़ने का फैसला किया. इसके बाद इंदिरा के विरोधियों में खुशी की लहर दौड़ गई. पूरे चुनाव के दौरान स्थिति यह थी कि जगजीवन राम की लहर चल रही थी. कहा जा रहा था कि इंदिरा की कुर्सी चली जाएगी. लेकिन चुनाव के जो नतीजे सामने आए वह भी इसी तरह के थे. और कहा जाने लगा कि अब जगजीवन राम प्रधानमंत्री बन सकते हैं. लेकिन मोराजी देशाई की चाल से आगे नहीं निकल सके. जनता पार्टी में प्रधानमंत्री की रेस में मोरारजी देशाई, जगजीवन राम और चौ. चरण सिंह का नाम चल रहा था. हालांकि इन सब के बीच में जय प्रकाश नारायण आए और उन्होंने मोरारजी देशाई का नाम आगे कर दिया. जेपी के इस फैसले से जगजीवन राम बहुत नाराज हो गए और देसाई के कैबिनेट में शामिल होने से मना कर दिया. इतना ही नहीं शपथग्रहण सामारोह में भी शामिल नहीं हुए. लेकिन जेपी को एक बार फिर से हस्तक्षेप करना पड़ा. जेपी ने जगजीवन के सामने एक भावुक अपील की ऐसा लग रहा था जैसे जेपी अब बस हाथ जोड़कर कह देंगे आप शामिल हो जाएगी. लेकिन उससे पहले ही जगजीवन का दिल पसीज गया और वे कैबिनेट में शामिल हो गए. उस कैबिनेट में उन्हें रक्षा मंत्रालय दिया गया. और चौधरी चरण सिंह के साथ उपप्रधानमंत्री का पद भी दिया गया. जगजीवन राम भले ही कांग्रेस से बाहर हो गए लेकिन इंदिरा गांधी के वे कभी भी करीबी नहीं हो पाए. और इंदिरा की बहु ने तो वो कर दिया जिसके चलते उनका राजनीति जीवन ही खत्म हो गया.

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यह घटना साल 1977 का है जब रामलीला मैदान में इंदिरा गांधी के विपक्षी एक जनसभा करने वाले थे. इस जनसभा में अटल बिहारी बाजपेयी के भाषण को याद किया जाता है. कहते हैं वे अपना भाषण इतना रुक रुक कर देते थे कि लोग उठ कर जाने लगते थे. खैर रामलीला मैदान में जो भीड़ पहुंची थी वह जगजीवन बाबू के कारण ही पहुंची थी. लेकिन इस भीड़ को रोकने के लिए कांग्रेस ने भी पूरे हथकंडे अपनाए थे राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे उनके करीबी विद्याचरण शुक्ल उनके करीबी थे और सूचना प्रसारण मंत्री भी थे उन्होंने फैसला किया की रैली वाले दिन शाम को दूरदर्शन पर बॉबी फिल्म दिखाई जाएगी. जिसमें यह कहा गया कि लोग फिल्म देखेंगे राम लिला मैदान कोई नहीं आएगा लेकिन मैदान में खचाखच भीड़ थी स्थिति यह थी कि वहां बारिश होने लगी तो लोगों ने छाता लगा कर पूरा भाषण सुना. अगले दिन अखबार की हेडिंग थी वावू बिट्स बॉबी

बाबू जगजीवन राम के राजनीतिक सफर के पतन का कारण बने उनके अपने बेटे और इंदिरा गांधी की बहू मेनका गांधी. बता दें कि मेनका गांधी सूर्या नाम की एक मैग्जीन के संपादक थे. सूर्या मैग्जीन में उनके बेटे की एक लड़की के साथ आपत्ती जनक तस्वीर छाप दी. बता दें कि यह तस्वीर कंसल्टिंग एडिटर खुशवंत सिंह के पास आई थी. खुशबंत ने अपनी ऑटोबायोग्राफी में बतााय है कि यह तस्वीर पूरी तरह से पॉर्न था. लेकिन इसे छापा गया. उसके बाद पूरे देश में हंगामा मच गया और उस समय के उपप्रधानमंत्री बाबू जगजीवन राम पर इसका असर देखने को मिला. और यहीं से उनके राजनीतिक पतन का कारण भी बना. कहा जाता है कि इस पूरे मामले में डीयू के छात्र नेता केसी त्यागी का नाम सामने आता है. हालांकि बाद में जगजीवन राम के बेटे सुरेश ने उस लड़की सुषमा के साथ शादी कर ली लेकिन इसका कोई भी राजनीतिक फायदा नहीं मिला. दवी जवान से राजनेता आज भी यह कहते हैं कि जगजीवन राम के राजनीतिक कैरियर को खत्म करने के लिए उस फोटा का इस्तेमाल किया गया था.

बाबू जगजीवन राम यह भी बताते हैं कि उनके मंत्री रहने के बाद भी जगन्नाथ मंदिर में उनके परिवार के लोगों को अंदर जाने नहीं दिया गया. हालांकि बाद में उन्होंने भी उस मंदिर में अंदर जाने से मना कर दिया था. साल 1978 में जब वे रक्षा मंत्री थे तो वाराणसी में संपूर्णानंद की मूर्ति का अनावरण करना था जब वे वहां से चले गए तो वहां पर कुछ ब्रह्मणों ने यह कहकर उस मूर्ती को धो दिया कि इसे एक दलित ने छुआ है. इसके बाद जगजीवन राम का बयान आया जिसमें उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति ये समढता है कि किसी को छू देने से पत्थर की मूर्ति अपवित्र हो गई, उसका दिमाग पथ्तर जैसा है.

कांग्रेस जब दोबारा सत्ता में आई तो जगजीवन राम फिर से कांग्रेस में आना चाहते थे लेकिन ऐसा नहीं हो सका लेकिन उनकी बेटी मीरा कुमार लोकसभा की अध्यक्ष बनें.

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