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बिहार का एक ऐसा बेटा जो राजनीतिक चाल का शिकार हो गया. उसकी हत्या की गुत्थी आज तक नहीं सुलझ पाई है. सरकारें आई गई, जज के बाद जज बदलते रहे लकिन उस गुत्थी को आज तक कोई भी नहीं सुलझा पाया. यह व्यक्ति अपने कार्यों के लिए हमेशा याद किया जाएगा. जब वे केंद्र में मंत्री के पद पर रहे तो बिहार के लिए कई अहम कार्य किया था. उत्तर बिहार में आने वाले बाढ़ को नियंत्रण करने के लिए उन्होंने कोशी योजना में पश्चिमी नहर के निर्माण के लिए नेपालभारत समझौता करया था. इन्होंने मिथिला की पेंटिंग को देशविदेश में पहुंचाया जिससे बिहार को एक अलग पहचान दिया. आपको भी समझ में आ ही गया होगा हम बात कर रहे हैं ललित नारायण मिश्रा के बारे में

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बिहार का एक ऐसा राजनेता जिसके दिमाग में बिहार को लेकर एक विजन था एक सोच था. लेकिन एक ऐसी घटना हुई जिसमें उनका पूरा सपना धरा का धरा रह गया और वे हमलोगों के बीच से चले गए. ललित नारायण मिश्रा आजाद भारत के पहले कैबिनेट मंत्री हैं जिनकी हत्या हो गई. और यह गुत्थी आज तक नहीं सुलझ पाई है. आपको बता दें कि 2 जनवरी 1975 को बिहार के समस्तीपुर रेलवे स्टेशन पर उनपर हमला किया गया था. जिसमें वे बूरी तरह से घायल हो गए थे. जिसके बाद उन्हें इलाज के लिए पटना भेजा गया था. ललित बाबू को जिस ट्रेन से पटना भेजा गया था वह ट्रेन 7 घंटे लेट से दानापुर पहुंची थी. यानी कि इस ट्रेन को 7 घंटे में दानापुर पहुंचना था यह ट्रेन 14 घंटे में दानापुर पहुंची थी. जिसमें उनका इलाज ठीक से नहीं हो सका और आखिर में उनकी जान चली गई. अब उनकी हत्या की गुत्थी आज तक एक मिस्ट्री बनी हुई है.

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तो चलिए अब जान लेते हैं उनकी हत्या हुई कैसे और उसकी गुत्थी आजतक सुलझी क्यों नहीं है.

वह दिन था 2 जनवरी 1975 का वे समस्तीपुर में एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए दिल्ली से पटना के लिए रवाना हुए. वे सरकारी विमान से आ रहे थे. जैसे ही विमान पटना पहुंचे तो यहां कोहरा ज्यादा था तो पायलट ने कहा कि हम दिल्ली लौट जाते हैं नीचे उतरने में परेशानी हो सकती है. लेकिन ललित बाबू नहीं माने उन्होंने कहा कि लोग इंतजार करेंगे. न जाऊं, ये हो नहीं सकता. पायलट के लाख मना करने के बाद वे नहीं माने और प्लेन पटना रनवे पर उतरा और समस्तीपुर रेलवे स्टेशन पर वे भाषण देने के लिए मंच पर पहुंचे. उन्होंने अपने कार्यों के बारे में बताया रेलवे को आगे बढ़ाने को लेकर बताया. फिर जब वे मंच से नीचे उतरे तो भीड़ से एक व्यक्ति ने बम फेका जिसमें वे बूरी तरह से घायल हो गए. हालांकि घायल होने वालों में उनके छोटे भाई जगन्नाथ मिश्रा भी थे. लेकिन इस हादसे में उनके साथी एमएलसी सूर्य नारायण झा और रेलवे के एक कर्मचारी की मौत हो गई. बता दें कि इस घटना में 11 लोग बूरी तरह से घायल हुए थे. इस घटना के एक दिन के बाद रेलवे ने FIR दर्ज किया और यह केस CID को सौंप दिया गया. उसके बाद बिहार के हस्तक्षेप के बाद यह केस CBI के पास पहुंच गया.

जिस दिन यह घटना हुई उस दिन के पूरे घटना क्रम को लेकर कई तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं. उसमें सबसे पहले यही का जा रहा है कि समस्तीपुर रेलवे स्टेशन से 40 किलोमीटर की दूरी पर दरभंगा मेडिकल कॉलेज यानी की DMCH था. जहां पहुंचना आसान था लेकिन उस दिन डॉक्टरों का हड़ताल था. ऐसे में अब सवाल यह उठ रहा है कि इस तरह की घटना के दौरान भी क्या डॉक्टरों को हड़ताल पर रहना चाहिए था. इसी के बाद ललित बाबू को पटना ले जाने का फैसला किया गया. अब दूसरा आरोप यह लगता है कि जब उन्हें ट्रेन से ले जाने का फैसला किया गया तो 132 किलोमीटर का सफर जोकि 6 से 7 घंटे में पूरा किया जा सकता था उस ट्रेन को यह सफर पूरा करने में 14 घंटा क्यों लगा. बताया जाता है कि यह ट्रेन घंटों यार्ड में खड़ी रहती थी. ट्रेनों को शंटिग में डाल दिया जाता था. जब ललित बाबू अस्पताल पहुंचे तो उन्होंने लोगों से कहा कि जगन्नाथ को देखों उसकी हालत ज्यादा खराब है. और किश्मत देखिए जगन्नाथ बाबू बच गए.

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इस हत्या की गुत्थी सुलझाते हुए CBI ने जब अपनी चार्ज शीट दाखिल की तो उसमें बताया गया कि त्रिमोहन गांव में एक सभा हुई जिसमें यह तय हुआ था कि विनयानंद उर्फ जगदीश माधवानंद की हत्या की थी. उसके बाद विश्वेश्वरानंद उर्फ विजय को उस समय के प्रदेश के मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर के जान लेने की जिम्मेदारी मिली थी. उसके बाद रंजन द्विवेदी, संतोषानंद और सुदेवानंद को ललित बाबू की हत्या की जि्ममेदारी मिली थी. इन नामों के अलावा राम आश्रय प्रसाद को पांच बम इंतजाम करने की जिम्मेदारी मिली थी. यह सभी हथियार गोपाल जी नाम के व्यक्ति के पास रखा गया था. हालांकि इस पूरी कहानी को साल 1977 में ललित बाबू की पत्नी कामेश्वरी देवी ने खारिज कर दिया और देश के उस समय के गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह को एक खत लिखा जिसमें इस हत्याकांड को फिर से जांच करने की बात कही. नवंबर 2014 में सेशन कोर्ट ने रंजन द्विवेटी, संतोषानंद और सुवेवानंद और गोपाल जी को उम्रकैद की सजा सुनाई. इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील हुई और 2015 में ये सभी जमानत पर छूट गए. इस दौरान ललित बाबू का पूरा परिवार यह कहता रहा कि जिन्हें सजा हुई है वे निर्दोष हैं.

हालांकि इस दौरान कई तरह अफवाहों को भी खुब बल मिला जिसमें यह कहा जाने लगा था कि ललित बाबू का कद राजनीति में बड़ा हो रहा है यानी की उनकी लोकप्रियता बढ़ती जा रही है वह भी उस समय जब इंदिरा गांधी की राजनीतिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी. ऐसे में लोगों द्वारा यह कहा जाने लगा कि साजिस के तहत इनकी हत्या करवाई गई है. कहा जाता है कि ललित बाबू इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के काफी करीब थे. राजनीतिक जानकार यह भी बताते हैं कि अगर ललित बाबू जिंदा होते तो जयप्रकाश नारायण और इंदिरा के बीच में इतनी दूरियां नहीं होती. ललित बाबू के कार्यों को अगर हम देखेंगे तो उन्होंने मिथिलांचल के विकास को लेकर कई काम किये हैं. उन्होंने लखनऊ से असम तक लेटरल रोड की मंजूरी करवाई थी. जोकि मुजफ्फरपुर, दरभंगा और फारबिसगंज होते हुए जाते थे. रेल मंत्री रहते हुए उन्होंने झंझारपुरलौकहा रेललाइन, भपटियाही से फारबिसगंज रेललाइन जैसी 36 रेल योजनाओं के सर्वेक्षण की स्वीकृति इन्होंने दी थी. लेकिन उनकी मृ्त्यु आज भी एक राज ही बना हुआ है.

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