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बिहारी बेजोड़ के आज के सेगमेंट में हम बात करेंगे एक ऐसे बिहारी अभिनेता के बारे में जो काफी संवेदनशील है. चाहे वह फिल्म हो या फिर निजी जीवन दोनों ही जगह पर यह अपनी संवेदना के लिए जाना जाता है. फिल्मों में इनकी संवेदना देखना कर लोगों के आंखों से आंसु निकल आएंगे और जब आप इनका निजी जीवन जानेंगे तो कहेंगे सच में यह व्यक्ति इतना संवेदनशील है. इस अभिनेता में प्रतिभा कुट कुट कर भरा हुआ है. जिस किरदार को पकड़ ले उसमें जैसे समा जाता है. और उसके बाद उस किरदार हो जाता है. यह अभिनेता हर किरदार में फिट बैठता है. आप इस अभिनेता का सिरियस रॉल देख लिजिए या फिर कॉमेडी आपको मजा उतना ही मिलने वाला है लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब सबकुछ छोड़ छाड़ कर इन्होंने ऋषिकेष को अपना घर बना लिया और एक ढावे में काम करने लगे थे. जी हां आप सही समझ रहे हैं हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड अभिनेता संजय मिश्रा के बारे में

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हम इस अभिनेता के फिल्मों में संवेदनशिलता को देखेंगे लेकिन उससे पहले एक नजर उनके जीवन पर डाल लेते हैं. इस अभिनेता काजीवन कोई गरीबी में नहीं बिता था लेकिन इस अभिनेता ने अपने आप के ऊपर कभी इस बात का एहसास नहीं होने दिया कि उनकी पृष्ठभूमि क्या है. इस अभिनेता का जन्म बिहार के दरभंगा में हुआ था, लेकिन बचपन पटना में बिता था. पिता पेशे से पत्रकार थे और दादाजी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट हुआ करते थे. लेकिन संजय ने अपने कैरियर के लिए कुछ और ही सोचा था. संजय का बचपन बनारस की गलियों में बिता है. वे बनारस केंद्रीय विद्यालय से पढ़े लिखे हैं. शुरूआती शिक्षा के बाद उन्होने NSD का रूख किया. यहां उन्होंने एक्टिंग का गुर सीखा. और यहां से शुरू होती है संजय के फिल्मी दुनिया की कहानी. संजय को चाणक्य सीरियल में पहली बार मौका मिला था. इस सीरियल में उन्होंने कई टेक और रिटेक भी लिये थे हालांकि यह दौर लंबे समय तक नहीं चला और साल 1995 में आई फिल्म ओह डार्लिग ये हैं इंडिया में नजर आए संजय मिश्रा. इसके बाद इन्हें सत्या और राजकुमार फिल्मों में छोटे छोटे रोल में दिखाई दिए. इन छोटी छोटी रोल के बाद आया फिल्म आंखो देखी जिसने हर किसी को संजय मिश्रा के बारे में बात करने और सोंचने तक को मजबूर कर दिया. इस फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेयर क्रिटिक अवॉर्ड फॉर बेस्ट एक्टर के अवॉर्ड से नवाजा गया. यह वह दौर था जब संजयको फिल्मों में सोहरत मिल रही थी अवार्ड मिलने लगे थे. लेकिन अचानकर से बॉलीवुड का यह अभिनेता फिल्म की दुनिया से बाहर निकल गया जैसे वह इस मायानगरी को जानता ही नहीं है वह उत्तराखंड के ऋषिकेष में एक ढावे में काम करने लगा. संजय के बारे में यह बताया जाता है कि उन्होंने इस दौरान उन्होने चाय बनाने से लेकर वर्तन धोने तक का काम किया.

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दरअसल संजय मिश्रा के पिता की मौत होने के बाद वे सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाए और ऋषिकेश जाने का फैसला कर लिया था. पिता से साया उठने के बाद उनके मन में एक तरह का बैराग्य उत्पन्न हो गया था. उन्हें किसी चीज में मन नहीं लगता था. लेकिन जिंदा रहने के लिए कुछ तो करना होगा. इसी पेट पालने को लेकर उन्होंने ठेले पर काम किया जिसमें सब्जी काटने से लेकर चाय बनाने और बर्तन धोने का जिक्र आता है. कहते हैं संजय ने बचपन से वही किया जो उनको अच्छा लगा, उन्होंने पढ़ाई तक नहीं की क्योंकि उन्हें पढ़ने में मन नहीं लगता था. संजय जब उत्तराखंड पहुंचे तो यहां भी उन्होंने पसंद का काम किया और वह भी खाना बनाना.

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उस दौरान रोहित शेट्टी का डायरेक्शन की दुनिया में जलवा था. संजय मिश्रा ने उनकी कई फिल्मों में काम भी किया था ऐसे में वो एक बार फिर से संजय को खोज रहे थे और इसी दौरान संजय को फोन लगाया. संजय अपनी दुकान में मस्त थे. और इधर रोहित गोलमाल के लिए कास्ट कर रहे थे. इस दौरान जब संजय और रोहित की बातचीत हुई जिसमें रोहित संजय को मनाने में सफल हो गए. और एक बार फिर से संजय मिश्रा फिल्मी दुनिया में प्रवेश कर गए. जब संजय मिश्रा लौट कर आए तो उनके पास फिल्मों की लाइन लग गई. इस दौरान इनकी कई फिल्में हीट हुई जिसमें फंस गए रे ओबामा‘, ‘ मिस टनकपुर हाजिर हो‘, ‘प्रेम रतन धन पायो‘, ‘मेरठिया गैंगस्टर्सऔर दम लगाके हायेशाजैसी कई हिट फिल्में कीं और अपनी अलग पहचान बनाई.

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संजय मिश्रा के अगर आप पारिवारिक जीवन को देखें तो उनकी पत्नी का नाम किरन मिश्रा है. उनकी दो बेटियां हैं पाल मिश्रा और लम्हा मिश्रा. जरा याद करिए संजय के उन दिनों को जब संजय मिश्रा अपना पूरा जीवन छोड़कर ऋषिकेष चले गए थे और उसके बाद जब लौट कर आए तो सफलता की एक नई गाथा लिख दी. संजय आज 20 करो़ड़ के मालिक हैं. और आज भी अपनी इच्छा के अनुसार ही फिल्में करते हैं.

तो चलते चलते आपसे एक सवाल संजय मिश्रा आपको कैसे अभिनेता लगते हैं. और आप उन्हें किस किरदार के लिए याद करते हैं.

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